उन्होंने प्रदेश सरकार से सामाजिक न्याय समिति-2001 की सिफारिश के अनुसार अन्य पिछड़े वर्ग को तीन श्रेणियों में विभाजित कर अलग-अलग आरक्षण दिए जाने की मांग की है।
निषाद ने कहा कि उप्र सरकार अतिपिछड़ी व अत्यंत पिछड़ी जातियों को सामाजिक-राजनीतिक अन्याय का शिकार बना रही है। उन्हांेने कहा कि राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष रामआसरे विश्वकर्मा ने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा उत्तर प्रदेश के संदर्भ में संस्तुति मांगे जाने को यह कह कर नकार दिया था कि प्रदेश सरकार के पास जनसंख्या का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
निषाद ने कहा कि तीन अक्टूबर, 2013 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अपने अंतरिम निर्णय में कहा था कि पिछड़े वर्ग की कुछ जातियां अपने जनसंख्या के अनुपात में कई गुना आरक्षण का लाभ लेकर समुन्नत हो गई है, लेकिन मल्लाह, केवट, बिंद, राजभर, नोनिया, कुम्हार, नाई, बारी, फकीर, जुलाहा, बंजारा, लोधी, किसान, कहार, हज्जाम, गद्दी, धीवर, बियार, कोयरी, माली, सैनी, लोहार, बढ़ई, कसाई, मनिहार, रंगरेज आदि जातियां आरक्षण के लाभ से वंचित हो रही है।
उन्होंने कहा कि न्यायालय ने अपने जनसंख्या के अनुपात से अधिक आरक्षण पाई जातियों को आरक्षण के लाभ से वंचित कर वंचितों को आरक्षण का विशेष अवसर दिए जाने का निर्णय दिया, लेकिन सपा सरकार ने न्यायालय के निर्णय को अमल में नहीं लाया, जो अतिपिछड़ा विरोधी कदम है।
निषाद ने कहा कि मंडल कमीशन के सम्मानित सदस्य एलआर नायक ने भी पिछड़े वर्ग का दो श्रेणियों में विभाजन कर अतिपिछड़ी, पुश्तैनी पेशेवर जातियों को अलग से 17 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रस्ताव किया था।
उन्होंने कहा कि बिहार में कर्पूरी फार्मूला के तहत अतिपिछड़ों को अलग से आरक्षण की व्यवस्था है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, हरियाणा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पंश्चिम बंगाल, उड़ीसा आदि राज्यों में पिछड़े वर्ग का दो या दो से अधिक श्रेणियों में उपवर्ग बनाकर अलग-अलग आरक्षण दिया जा रहा है।
dharmpath.com dharmpath