तुषार वाघेला की फिल्म ‘द होम’ दिखेगी मेक्सिको फिल्मोत्सव में

‘द होम’ को भारत सरकार के फिल्म डिवीजन द्वारा आयोजित मुंबई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव तथा फ्रांस, स्पेन, रशिया, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों के फिल्म फेस्टिवल में भी शामिल किया जा चुका है।

तुषार ने एक्सपेरिमेंटल सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई है। वह विशेष तरह की प्रायोगिक फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। उनकी फिल्में अब तक 50 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों, संग्रहालयों, आर्ट गैलरियों में प्रदर्शित की जा चुकी है।

वाघेला ने बताया कि ‘द होम’ फिल्म का विषय बहुत ही गहराई लिए हुए है तथा इसका चित्रण और ध्वनि प्रभाव बहुत ही प्रायोगिक है। यही वजह है कि इसे महत्वपूर्ण फिल्म महोत्सवों में शामिल किया जा रहा है।

यह फिल्म मनुष्य और लाखों सूक्ष्म जीव-जंतुओं के एक ही घर में निवास करने के तथ्य तथा आपस के परस्पर संघर्ष पर आधारित है। फिल्म में बहुत ही लयबद्ध एव विस्मृत कर देने वाला ध्वनि प्रभाव है जो सूक्ष्म जीव जगत के हमारे बीच होने का अहसास कराता है।

तुषार वाघेला सक्रिय रूप से समकालीन कला पर कार्य कर रहे हैं और देश-विदेश की आर्ट गैलरियों में अपनी कला का प्रदर्शन करते आ रहे हैं। अभी हाल ही में उन्होंने पेरिस की एक आर्ट गैलरी में छत्तीसगढ़ डायरीज सीरीज की पेंटिंग की प्रदर्शनी लगाई।

तुषार ने छत्तीसगढ़ राज्य के नवनिर्माण के बाद छत्तीसगढ़ विधानसभा भवन, राजभवन, मंत्रालय आदि अनेक महत्वपूर्ण शासकीय भवनों के लिये भारत के महापुरुषों के पोट्र्रेट भी बनाए हैं।

तुषार वाघेला छत्तीसगढ़ के प्रमुख फिल्मकार और विजुअल आर्टिस्ट हैं। उनका जन्म 6 जनवरी 1975 को दुर्ग, छत्तीसगढ़ के डॉक्टर परिवार में डॉ. के.पी. वाघेला और डॉ. मालती वाघेला के यहां हुआ। वह दृश्यकला एवं फिल्म निर्माण क्षेत्र में किसी भी तरह का प्रशिक्षण या अकादमिक शिक्षा प्राप्त किए बगैर पिछले 20 वर्षों से छत्तीसगढ़ में रहते हुए विजुअल आर्ट, वीडियो आर्ट एवं एक्सपेरिमेंटल सिनेमा के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहे हैं।

तुषार की कला के मुख्य विषय-वस्तु ज्यादातर छत्तीसगढ़ राज्य पर ही केंद्रित होते हैं। उन्होंने पेंटिंग सीरीज ‘छत्तीसगढ़ डायरीज इन पेंटिंग्स’ में छत्तीसगढ़ के ग्रामीण एवं शहरी जनजीवन को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक दृष्टिकोण से चित्रित किया है।

उनके वीडियो आर्ट एवं फिल्में लगभग अमूर्त और प्रयोगवादी हैं। उनकी फिल्मों के दृश्य तकरीबन काव्यात्म हो जाते हैं। ये फिल्में ध्वनि और दृश्य के ताने-बाने से गढ़ी गई हैं और कई परतें लिए हुए बहुत ही गहराई से अपनी बात को पर्दे पर कहती हैं।

About admin


Notice: ob_end_flush(): Failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home4/dharmrcw/public_html/wp-includes/functions.php on line 5493