भारत जी-20 के पिछली बचनबद्धताओं का समर्थन करेगा

नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा कि भारत जी-20 कृषि मंत्रियों की पिछली बैठकों में किए गए समझौतों, विशेष रूप से अनुसंधान और विकास, सहयोग और जानकारी हस्तांतरण, अनाज की हानि और बरबादी से निपटने के लिए कार्रवाई और सूचना तथा संचार प्रौद्योगिकियों से संबंधित समझौतों के शीघ्र कार्यान्वयन में मदद करेगा।

जर्मनी के बर्लिन में जी-20 देशों के कृषि मंत्रियों की बैठक को संबोधित करते हुए सिंह ने कहा कि भारत एएमआईएस को सुदृढ़ बनाने के प्रस्ताव का समर्थन करता है। उन्होंने भंडारों के मूल्यांकन के महत्व को रेखांकित किया और इस बारे में उत्कृष्ट पद्धतियों को साझा करने का सुझाव दिया।

कृषि मंत्रालय से जारी बयान के मुताबिक, सिंह ने कहा कि जर्मनी की अध्यक्षता में जी-20 के अंतर्गत कृषि क्षेत्र संबंधी विचार-विमर्श में प्राकृतिक संसाधनों, विशेष रूप से पानी पर बढ़ते दबाव और खेती में डिजिटीकरण की आवश्यकता पर समुचित ध्यान केंद्रित किया गया है।

कृषि मंत्री ने कहा कि भारत में कृषि वैज्ञानिक पद्धतियों, मूल्यों, उर्वरकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल की जानकारी तथा मौसम और कीटों से संबंधित संदेश सम्प्रेषित करने में आईसीटी एक कारगर और सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ है। कृषि क्षेत्र में संचार प्रक्रिया के लिए एक समन्वित ²ष्टिकोण विकसित करने हेतु कई नए उपाए शुरू किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि देश में कृषि विपणन प्रणाली में सुधार लाने के उद्देश्य से एक राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-एनएएम) पोर्टल शुरू किया गया है, जो अखिल भारतीय इलेक्ट्रोनिक व्यापार की सुविधाएं प्रदान करता है।

सिंह ने कहा कि देश में सक्षम सिंचाई पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए 2015 में सरकार द्वारा एक प्रमुख सिंचाई कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसमें जल संरक्षण/वर्षा जल संग्रह और लघु सिंचाई के उपयोग के जरिए पानी के किफायती इस्तेमाल में सुधार लाने पर विशेष बल दिया गया।

सिंह ने कहा कि स्थायी वैश्विक खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य हासिल करने में जी-20 अर्थव्यवस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है और इस बात पर आम सहमति बढ़ रही है कि खाद्य और पोषण सुरक्षा बनाए रखने के लिए सदस्य देशों और गैर-सदस्य देशों के बीच सहयोगात्मक और समन्वित नीतियों के जरिए नवीन समाधानों की आवश्यकता है।

मंत्री ने कहा कि विश्व अर्थव्यवस्था ने वैश्विक खाद्य उत्पादन बढ़ाने में व्यापक तरक्की की है, लेकिन जलवायु संबंधी जटिलताओं में वृद्धि, प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव, मृदा स्वास्थ्य विकृत होने और जोत क्षेत्रों के विखंडन जैसी नई चुनौतियां इस बढ़ोतरी को बनाए रखने के प्रति गंभीर जोखिम उत्पन्न कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि विकासशील और अर्ध विकसित अर्थव्यवस्थाओं को, विशेष रूप से जिन अन्य प्रमुख मुद्दों का सामना करना पड़ रहा है, उनमें विपणन ढांचे का अभाव, अनाज की हानि और बरबादी, बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा कृषि ऋण कवरेज में कमी, और बार-बार होने वाले जलवायु परिवर्तनों से किसानों की उपज का बीमा जैसी समस्याएं शामिल हैं।

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