केन-बेतवा नदी जोड़ योजना झूठे आंकड़ों पर आधारित : जल विशेषज्ञ

भोपाल, 5 मार्च (आईएएनएस)। देश के जल विशेषज्ञ पानी संबंधी नीतियों और सिकुड़ते जा रहे जल संसाधनों पर चिंतित है। नदी जोड़ो योजना पर भी विशेषज्ञों ने सवाल उठाए और कहा कि केन-बेतवा नदी जोड़ योजना झूठे आंकड़ों पर आधारित है।

राजधानी में डॉ.अजय खरे की स्मृति मे चल रही व्याख्यानमाला में हिस्सा लेने पहुंचे जल विशेषज्ञों ने ‘जनता के लिए स्वास्थ्य और पानी का अधिकार अभी’ विषय पर चर्चा के दौरान रविवार को बेवाक राय रखी।

पानी और ऊर्जा के शोधकर्ता और मंथन अध्ययन केंद्र के समन्वयक श्रीपाद धर्माधिकारी ने बताया, “आम जनमानस में यह सोच है कि पानी पर पहला अधिकार मानव जाती का है। सरकारी दस्तावेज भी यही बताते हैं। बड़े बांध बनाए जा रहे हैं और भूगर्भ जल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है, इससे कई समस्याएं खड़ी हो रही हैं। निजीकरण के माध्यम से पानी को कार्पोरेट को सौंपा जा रहा है।”

उन्होंने आगे कहा कि पानी को लेकर बनी सोच में कुछ बदलाव आया है और राष्ट्रीय जल नीति 2012 में माना गया है कि पानी पर्यावरण का हिस्सा है। जीव-जंतुओं और इस पर निर्भर समाज को भी नदी पारिस्थिकी का हिस्सा माना गया है। पर्यावरणीय बहाव के माध्यम से नदियों को जिंदा रखने की बात सिद्धांतत: स्वीकार कर ली गई है, लेकिन इसके मैदानी बदलाव अभी दिखाई नहीं दे रहे हैं। पहले की तरह ही जल प्रबंधन की योजनाएं जारी हैं।

सेंटर फॉर इनलैंड वाटर इन साउथ एशिया के समन्वयक डॉ. ब्रज गोपाल ने कहा कि केंद्रीय जल आयोग के इंजीनियरों में नदियों को समझने की क्षमता ही नहीं है। उन्हें नदियों में केवल पानी दिखाई देता है, जबकि ब्रह्मपुत्र, कावेरी, सिंधु, नर्मदा, यमुना, गंगा आदि हर नदी की प्रति अलग-अलग है और यही उनकी खासियत है।

उन्होंने केन बेतवा नदी जोड़ योजना के संबंध में कहा कि नहरों के माध्यम से पानी का अंतरण बहुत सारी चीजों पर असर डालता है। नदी को सिर्फ पानी समझना नादानी है। केन-बेतवा नदी जोड़ योजना गलत, अधूरे और थोड़े झूठे आंकड़ों पर आधारित है। अब यह नदी जोड़ योजना नहीं, बल्कि स्थानापन्न योजना बन गई है।

राजीव गांधी वाटरशेड मिशन के पूर्व सलाहकार के.जी़ व्यास ने कहा कि हमारे पास पर्याप्त जल संसाधन हैं और मध्यप्रदेश की सारी नदियों को जिंदा किया जा सकता है, लेकिन अंतिम लक्ष्य तय किए बिना किए जा रहे कार्यो के कारण यह प्रयास फलदायी नहीं हो पा रहे हैं।

इसके पूर्व परंपरागत जलस्रोतों के जानकार राकेश दीवान ने विचार व्यक्त किए। वहीं मध्यप्रदेश विज्ञान सभा के एस़ आऱ आजाद ने विषय का ब्यौरा दिया।

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