भारत में निजी औषधि निर्माता कंपनियों की संख्या 850,000 से भी अधिक है, लेकिन ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) पर रोकथाम के अभियान में सिर्फ नौ फीसदी निजी कंपनियां ही शामिल हैं।
भारत में निजी औषधि निर्माता कंपनियों की संख्या 850,000 से भी अधिक है, लेकिन ट्यूबरकुलोसिस (टीबी) पर रोकथाम के अभियान में सिर्फ नौ फीसदी निजी कंपनियां ही शामिल हैं।
शोधपत्रिका ‘जर्नल ऑफ फार्मास्यूटिकल्स प्रैक्टिस एंड पॉलिसी’ के जनवरी, 2017 अंक में प्रकाशित एक शोध-पत्र से यह खुलासा हुआ है।
‘एंगेजमेंट ऑफ द प्राइवेट फार्मास्युटिकल सेक्टर फॉर टीबी कंट्रोल : र्यूटोरिक ऑर रियलिटी?’ शीर्षक से प्रकाशित इस शोध-पत्र में देश में टीबी के खिलाफ लड़ाई में निजी एवं सार्वजनिक उपक्रमों के सम्मिलित हस्तक्षेप की समीक्षा की गई है। इसके अलावा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और दुनिया से टीबी को 2003 से 2015 के बीच पांच चरणों में खत्म करने के लिए शुरू किए गए अभियान ‘स्टॉप टीबी पार्टनरशिप’ जैसे वैश्विक दस्तावेजों का विश्लेषण भी किया गया है।
भारत ने पूरे देश से 2025 तक टीबी के उन्मूलन का लक्ष्य रखा है, जिसके लिए जरूरी होगा कि टीबी के नए मामलों में 95 फीसदी की कटौती लाई जाए।
भारत में टीबी के कारण होने वाली मौतों की संख्या 2014 में 220,000 से दोगुना बढ़कर 2015 में 480,000 हो गई। हालांकि ऐसा निजी क्षेत्र द्वारा मामलों की रपट दिए जाने से हुआ है।
टीबी पर रोकथाम के लिए चलाए जा रहे देश के सबसे बड़े कार्यक्रम संशोधित नेशनल ट्यूबरकुलोसिस कंट्रोल प्रोग्राम (आरएनटीसीपी) के तहत निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) में देश के चार राज्यों के 12 जिलों में टीबी की पहचान और उस पर रोकथाम के लिए 75,000 दवा की दुकानों को जोड़ा गया है।
इस अध्ययन में पाया गया कि औषधि विक्रेताओं द्वारा दो वर्ष के दौरान रेफर किए गए 7,000 व्यक्तियों में से 10 से 15 फीसदी व्यक्ति टीबी से ग्रस्त थे।
शोधकर्ताओं ने लिखा है, “स्पष्ट है कि दवा की दुकानों को अभियान में शामिल करना कितना सफल रहा है, बल्कि देशव्यापी स्तर पर इसे और बढ़ाए जाने की जरूरत है।”
एक अन्य स्वास्थ्य शोधपत्रिका ‘लांसेट’ में नवंबर, 2016 में प्रकाशित शोध-पत्र के अनुसार, टीबी के लिए 1997 में डॉट्स के रूप में टीबी का इलाज निशुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है, लेकिन उसके बाद से अब तक करीब 50 फीसदी (22 लाख) टीबी मरीजों ने निजी क्षेत्र की चिकित्सा ली है।
भारत सरकार द्वारा फरवरी, 2017 में जारी ‘नेशनल स्ट्रेटजिक प्लान फॉर ट्यूबरकुलोसिस इलिमिनेशन 2017-2025’ के अनुसार, भारत सरकार टीबी नियंत्रण और इसकी रोकथाम के लिए निजी क्षेत्र को प्रमुख हथियार के रूप में देखती है। बावजूद इसके सरकार अब तक टीबी पर बेहतर नियंत्रण पाने के लिए निजी क्षेत्र की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर सकी है।
इंडियन फॉर्मास्यूटिकल एसोसिएशन की चेयरमैन और उपाध्यक्ष मंजरी घरात कहती हैं, “जहां कहीं-कहीं पान वालों तक को डॉट्स कार्यक्रम से जोड़ा गया है, वहीं दवा विक्रेता इससे बाहर रह गए हैं।”
आईपीए ने 2006 में मुंबई में दवा विक्रेताओं को टीबी की पहचान करने और उन्हें इलाज की सलाह देने के लिए उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करने की एक प्रायोगिक परियोजना शुरू की गई थी। इस प्रायोगिक परियोजना में शामिल 150 दवा विक्रेताओं में से आधे दुकानदारों ने अपनी दुकानों में ही एक अलग सेंटर बना डॉट्स का वितरण शुरू कर दिया।
अब यह कार्यक्रम देश के आठ राज्यों – महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और गोआ – में चल रहा है। सिर्फ महाराष्ट्र में चार निकायों में कुल 134 दवा विक्रेताओं को इसमें शामिल किया गया है, जिनमें से 70 दुकानदार मरीजों को मुफ्त डॉट्स उपलब्ध करा रहे हैं और अब तक 68 मरीजों को रेफर कर चुके हैं और खुद 500 मरीजों का इलाज कर चुके हैं।
नवी मुंबई के सेक्टर-1 ऐरोली इलाके में दवा की दुकान चलाने वाले संदीप देशमुख भी डॉट्स उपलब्ध कराते हैं। उनका कहना है, “मैं इसे समाजसेवा की तरह देखता हूं, जिससे मुझे बेहद संतुष्टि मिलती है।”
नवी मुंबई केमिस्ट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष सतीश शाह का कहना है, “मरीज अमूमन सरकारी अस्पताल जाने से डरते हैं, क्योंकि वहां उन्हें लंबी-लंबी लाइनों में लगना पड़ता है और निजी चिकित्सक महीनों से खांसी आते रहने के बावजूद मरीजों को बलगम की जांच कराने के लिए कहते हैं। यहां दुकानदार असरकारक साबित हो रहे हैं।”
आरएनटीसीपी भविष्य में टीबी पर नियंत्रण पाने के इस अभियान में दवा विक्रेताओं को अधिक से अधिक संख्या में जोड़ना चाहता है, और इसे बढ़ाकर 500,000 करना चाहता है।
(आंकड़ा आधारित, गैर लाभकारी, लोकहित पत्रकारिता मंच, इंडियास्पेंड के साथ एक व्यवस्था के तहत। ये इंडियास्पेंड के निजी विचार हैं)
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