शाीय संगीत को पुनर्जीवित कर गया एचसीएल संगीत महोत्सव

नोएडा, 10 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय शाीय संगीत की लोकप्रियता निश्चित तौर पर आज अपने सबसे निचले स्तर पर है, लेकिन हाल ही में देश के तीन शहरों में आयोजित तीन दिवसीय संगीत महोत्सव ने साबित किया है कि देश के शीर्ष शाीय संगीतज्ञ इस अति प्राचीन संगीत परंपरा को आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

एचसीएल संगीत महोत्सव में प्रस्तुति देने वाले देश के दिग्गज सितार वादक पूर्बायन चटर्जी ने जो कहा वह और भी चौंकाने वाला है।

पूर्बायन चटर्जी ने बताया कि भारतीय शाीय पंरपरा के इस संगीत मोहत्सव में संगीत का आनंद लेने पहुंचे श्रोताओं में 70 फीसदी युवा थे।

चटर्जी ने आईएएनएस से कहा, “वे भारतीय शाीय संगीत में काफी रुचि रखते हैं और उसका लुत्फ उठाते हैं। इस तरह के बेहतरीन संगीत मोहत्सवों का अयोजन कर एचसीएल शानदार काम कर रहा है और यह संगीत महोत्सव हमें लोगों से जुड़ने का बेहतर मौका प्रदान करता है।”

एचसीएल कॉन्सर्ट्स का थीम ‘ट्र टू ऑवर रूट्स’ रखा गया था। संगीत महोत्सव के आखिरी दिन कई शीर्ष संगीतज्ञों ने अपनी-अपनी संगीत कला की प्रस्तुतियां दीं, जो संगीत रसिकों के लिए एक सुरमयी अनुभव में डूबी एक स्मरणीय शाम साबित हुई।

संगीत महोत्सव में अपनी कलाओं से संगीत रसिकों को सराबोर करने वाले शीर्ष संगीतज्ञों में पूर्बायन के अलावा गायक कौशिक चक्रवर्ती, बांसुरी वादक राकेश चौरसिया, तबला वादक तौफीक कुरैशी, तबला वादक सत्यजीत तालवलकर और हारमोनियम एवं कीबोर्ड वादक सुधांशु घरपुरे शामिल रहे।

आखिरी शाम की शुरुआत हाल ही में दुनिया को अपने गीतों का तोहफा दे हमेशा के लिए अलविदा कहने वाली प्रख्यात शाीय गायिका किशोरी अमोनकर को श्रद्धांजलि देने के साथ शुरू हुई। अमोनकर को श्रद्धांजलि स्वरूप कौशिक ने उनका प्रख्यात गीत ‘म्हारो प्रनाम..’ प्रस्तुत किया।

कौशिक की इस प्रस्तुति ने वहां मौजूद श्रोताओं और अमोनकर की मधुर यादों में गुम कर दिया और संगीत में डूबी एक नम स्मृति वाली शाम का आगाज किया।

संगीत महोत्सव में फ्यूजन संगीत की प्रस्तुति के दौरान श्रोताओं के सिर और पैर स्वत: संगीत की लय पर थिरकने लगे।

इस आखिरी शाम में आयोजकों ने बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से एक फ्यूजन संगीत के बाद एक शाीय संगीत प्रस्तुति को पिरो रखा था। बांसुरी वादक राकेश चौरसिया ने जब इसी तरह की एक फ्यूजन प्रस्तुति ‘अप्स एंड डाउन्स ऑफ लाइफ’ दी तो श्रोता जैसे मंत्रमुग्ध हो गए।

संगीत महोत्सव से इतर आयोजित एक समारोह के दौरान बतौर श्रोता महोत्सव में पहुंचे एचसीएल के एक कर्मचारी ने अर्थपूर्ण संगीत की दुनिया की हिस्सा बनने को लेकर खुशी व्यक्त की और कहा इस तरह की संगीत में पगी शामें जीवन की एकरसता और ऊबाउपन को तोड़ती हैं।

इस संगीत महोत्सव की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि श्रोताओं से कहीं अधिक खुद संगीतज्ञों ने संगीत का आनंद उठाया।

एचसीएल ने 1998 में भारतीय शाीय संगीत एवं कला रूपों को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से इस महोत्सव की शुरुआत की और हाल ही में आयोजित यह मोहत्सव रविवार को संपन्न हुआ।

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