नई दिल्ली, 2 नवंबर (आईएएनएस)। राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में अल्पना मिश्र की किताब ‘स्याही में सुर्खाब के पंख’ पर परिचर्चा चली, जिसमें हिंदी साहित्य जगत से जुड़ी कई नामचीन हस्तिओं ने अपनी बात रखी।
कार्यक्रम में प्रसिद्ध साहित्यकारों में शुमार विश्वनाथ त्रिपाठी, मृदुला गर्ग, प्रेम भरद्वाज, विभास वर्मा और नवीन कुमार नीरज ने अपने विचार व्यक्त किए। संचालन महेंद्र प्रजापति ने किया।
वरिष्ठ साहित्य समालोचक डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा, “कोई भी साहित्य जितना स्थानीय होता है, उसका प्रभाव दूर तक होता है। अल्पना मिश्र के लेखन की यही बड़ी बात है कि वो अपनी जमीन को पकड़े हैं।”
प्रेम भारद्वाज ने कहा, “अल्पना मिश्र की खासियत है कि वो टुकड़ों में लिखती हैं, बिल्कुल पिकासो के चित्र के तरह। वह संकेतों में बात करती हैं, जो कविता की पहचान है, मगर यह चीज इनकी कहानियों में है।”
लेखिका अल्पना मिश्र ने कहा, “जब मैं जीवन को जानने लगी, तो अपने निकट सारे चरित्र दिखने लगे, जो अपनी परस्थितियों से टकराते हैं और जीवन की इन्हीं जटिलताओं को पकड़ने और उनको समेट लेने की कोशिश मैंने अपने लेखन में की है।”
‘स्याही में सुर्खाब के पंख’ अल्पना की कहानियों का संग्रह है। इसमें शामिल अन्य कहानियां हैं- ‘कत्थई नीली धारियों वाली कमीज’, ‘चीन्हा-अनचीन्हा’, ‘सुनयना! तेरे नैन बड़े बेचैन’, ‘राग-विराग’, ‘इन दिनों’ और ‘नीड़’ अल्पना मिश्र की कथा-क्षमता विवरण-बहुलता में वास्तविकता के और-और करीब जाने की कोशिश में दिखाई देती है, जिसमें वह एक कुशल शिल्पी की तरह सफल होती हैं।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. कर चुकीं अल्पना की कहानियों में कहीं भी शाब्दिक चमत्कार से कथ्य या दृष्टि के अभाव को पूरा करने की न मजबूरी दिखाई देती है, न चालू मुहावरे का कोई ऐसा दबाव कि वे जीवन-स्थितियों के सच से अपनी पकड़ को जरा भी ढीली करें। नब्बे के दशक में सामने आए कथाकारों में उन्होंने अपनी एक विशिष्ट जगह बनाई है और लगातार चर्चा में रही हैं।
इनकी कुछ कहानियां पंजाबी, बांग्ला, कन्नड़, अंग्रेजी, मलयालम, जापानी व रूसी आदि भाषाओं में भी अनूदित हुई हैं। इन्हें शैलेश मटियानी स्मृति कथा सम्मान, परिवेश सम्मान, राष्ट्रीय रचनाकार सम्मान, शक्ति सम्मान, प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान व भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता द्वारा सम्मानित किया गया है।
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