सोमनाथ-आज जब पूरा भारतवर्ष ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मना रहा है, तो यह अवसर केवल एक ऐतिहासिक घटना को याद करने का नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना को नमन करने का है जिसने वर्षों के दमन के बाद भी खुद को सुरक्षित रखा.
सोमनाथ की त्रासदी का सबसे काला अध्याय 11वीं शताब्दी में शुरू हुआ. गजनी का शासक महमूद गजनवी, जो अपने पिता सुबुकतिगीन की मृत्यु के बाद अपने भाई को कैद कर सत्ता पर काबिज हुआ था, एक कट्टर और लालची आक्रांता था. इतिहासकारों के अनुसार, गजनवी के भारत पर 17 आक्रमणों के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य थे- पहला, इस्लामी कट्टरपंथ के तहत मंदिरों का विध्वंस कर अपनी धार्मिक विजय सिद्ध करना, और दूसर, भारत के मंदिरों में जमा अपार स्वर्ण संपदा को लूटना.
अक्टूबर 1024 में गजनवी 30 हजार घुड़सवारों के साथ गजनी से निकला. जनवरी 1026 में जब वह सोमनाथ पहुंचा, तो वहां का दृश्य रोंगटे खड़े करने वाला था. मंदिर की रक्षा के लिए स्थानीय ब्राह्मणों, निहत्थे शिवभक्तों और योद्धाओं ने दीवार बनकर मुकाबला किया. 8 जनवरी 1026 को जब गजनवी की सेना ने किले में प्रवेश किया, तो वहां एक भयानक नरसंहार हुआ.
अपनी आस्था की रक्षा करते हुए लगभग 50 से 70 हजार शिवभक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी. गजनवी ने न केवल ज्योतिर्लिंग को खंडित किया, बल्कि मंदिर के 56 नक्काशीदार खंभों को तोड़ दिया और वहां से लगभग 60 क्विंटल सोना, चांदी और बहुमूल्य रत्न लूटकर ले गया.
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