नई दिल्ली– नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत आए ब्रिक्स देशों के नेताओं के सम्मान में आयोजित राजकीय भोज में केवल शाकाहारी भोजन परोसा. इसके बाद भारत में भोजन, पहचान और राज्य की भूमिका को लेकर एक बड़ी बहस फिर शुरू हो गई है. इसमें मांसाहारी भोजन का कोई विकल्प नहीं था.
आधिकारिक आयोजनों में शाकाहारी भोजन परोसे जाने पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती. लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार आधिकारिक आयोजनों और सार्वजनिक संस्थानों के जरिए समाज में प्रभावशाली एक खास, ब्राह्मणवादी हिंदू पहचान से जुड़े खान-पान को पूरे देश के लिए सामान्य या राष्ट्रीय मानक के तौर पर पेश कर रही है? ऐसा करते हुए क्या वह उन खान-पान की परंपराओं को नजरअंदाज कर रही है, जिनमें मांस, मछली या अंडे खाने वाले देश के बहुसंख्यक लोग शामिल हैं?
राज्य में नागरिक के मांस न खाने के अधिकार की रक्षा करनी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही मांसाहारी भारतीय या मांसाहारी विदेशी मेहमान के खान-पान की पसंद को कम महत्व नहीं देना चाहिए. यह स्थिति कुछ महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है.विदेशी नेताओं के लिए आयोजित राजकीय भोज मोदी का निजी भोजन नहीं है, जिसे उनकी व्यक्तिगत खान-पान की पसंद के अनुसार आयोजित किया गया हो. यह एक आधिकारिक आयोजन है, जिस पर होने वाला खर्च सरकारी खजाने से किया जाता है और जिसे दुनिया के सामने भारत की एक झलक के तौर पर पेश किया जाता है.
विदेशी नेताओं के लिए पश्चिमी शैली का मेन्यू जरूरी नहीं है, लेकिन किसी राजकीय भोज में मेजबानी के साथ-साथ भारत की विविधता भी दिखाई देनी चाहिए. सोच-समझकर तैयार किए गए मेन्यू में शाकाहारी, वीगन, हलाल, मछली, चिकन और अलग-अलग क्षेत्रों के व्यंजनों के विकल्प रखे जा सकते हैं. इस तरह देश के अलग-अलग हिस्सों की खान-पान की परंपराओं को भी सामने लाया जा सकता है.
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