भोपाल-विजयादशमी सत्य की शक्ति और शक्ति की सार्थकता का महापर्व है। यह भारतीय चेतना का वह प्रकाश है, जो हमें विश्वास दिलाता है कि अन्याय कितना भी प्रबल हो, प्रतिकार का संकल्प उससे बड़ा होता है। असत्य का वैभव क्षणिक है, सत्य का सामर्थ्य शाश्वत। भगवान श्रीराम की विजय इसी विश्वास की प्रतिष्ठा है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य के प्रति आस्था के साथ उसकी रक्षा का साहस भी आवश्यक है। न्याय की कामना तभी फलित होती है, जब समाज उसके लिए खड़ा होने का संकल्प लेता है।
भगवान श्रीराम के देश में शक्ति की आराधना का उद्देश्य सदैव लोकमंगल रहा है। श्रीराम का धनुष पीड़ितों के लिए आश्वासन और अत्याचारियों के लिए चेतावनी है। उनका पराक्रम मर्यादा से प्रेरित है और उनका प्रत्येक संकल्प जनकल्याण के लिए समर्पित है। उन्होंने वनवास के कठिन मार्ग पर समाज के विभिन्न वर्गों को साथ लेकर यह सिद्ध किया कि विश्वास, संगठन और सामूहिक पुरुषार्थ से बड़ी से बड़ी चुनौती पर विजय प्राप्त की जा सकती है। यही हमारी सांस्कृतिक चेतना का आधार और राष्ट्रनिर्माण का मार्ग है।
विजयादशमी पर शस्त्र-पूजन इसी चेतना की अभिव्यक्ति है। शस्त्रों का पूजन करते हुए हम शक्ति के विवेकपूर्ण उपयोग और उसके साथ जुड़े उत्तरदायित्व को स्वीकार करते हैं। हम संकल्प लेते हैं कि हमारा बल निर्बल की रक्षा करे, हमारा साहस अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो और हमारा पराक्रम मानवता के कल्याण में समर्पित रहे। शस्त्र धारण करने वाले हाथों में संयम और निर्णय लेने वाले मन में संवेदना हो यही इस परंपरा का संदेश है। मर्यादा से अनुशासित शक्ति ही समाज का विश्वास बनती है।
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