बिहार में मुसलमानों को वोट बैंक मानने वाले परेशान हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने यहां विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। उनकी नजर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पर है।
बिहार में मुसलमानों को वोट बैंक मानने वाले परेशान हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने यहां विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। उनकी नजर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पर है।
ओवैसी की पार्टी को बिहार में कितनी सफलता मिलेगी, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि उनकी मौजूदगी खासतौर पर कांग्रेस, राजद ओर जद(यू) को जवाबदेह बनाएगी। ओवैसी ऐसा माहौल अवश्य बना देंगे, जिसमें कांग्रेस और लालू प्रसाद यादव को यह बताना होगा कि सबसे अधिक समय तक शासन करने के बाद यहां के मुसलमान पिछड़े, गरीब क्यों हैं। क्यों उन्हें अपना घर-द्वार छोड़कर दूसरे प्रदेशों में रोजगार की तलाश में जाना पड़ता है।
नीतीश कुमार से भी सवाल किया जाएगा कि उनके लिए पहले भाजपा बहुत अच्छी और बाद में खराब क्यों हो गई। उन्हें लालकृष्ण आडवाणी का नेतृत्व क्यों स्वीकार था और नरेंद्र मोदी से नाराजगी क्यों है। जबकि नीतीश कुमार ने 2004 में मोदी की प्रशंसा की थी। नीतीश को यह भी बताना होगा कि भाजपा से अलग होकर वह मुसलमानों का कितना भला कर सके।
जाहिर है कि ओवैसी के आने से चुनावी बहस पर असर जरूर पड़ेगा। मुसलमानों के नाम पर राजनीति करने वालों को अपना हिसाब अवश्य देना होगा।
शायद इसीलिए ओवैसी ने अपनी चुनावी रणनीति में मजहबी के साथ-साथ आर्थिक मुद्दा भी शामिल किया है। मजहबी एजेंडे के तहत उन्होंने बिहार के उन क्षेत्रों में दांव लगाने की तैयारी की है, जहां मुसलमानों की जनसंख्या अधिक है।
उनकी पार्टी ने सीमांचल के किशनगंज, कटियार, अररिया, पूर्णिया आदि जनपदों पर ध्यान केंद्रित किया है। यहां की सभी विधानसभा सीटों पर ओवैसी के उम्मीदवार किस्मत आजमाएंगे। आर्थिक मुद्दा यह है कि ओवैसी इस क्षेत्र के विकास की मांग उठा रहे हैं।
उन्होंने इन जिलों को मिलाकर सीमांचल विकास परिषद के गठन का वादा किया है। वह वादा निभाने की हैसियत में भले न हो पाएं, लेकिन विकास का मुद्दा उठाने में अव्वल हो सकते हैं। यह स्थिति कांग्रेस, नीतीश व लालू के लिए परेशानी का कारण होगी। इन्होंने सत्ता में रहते हुए अपने दायित्वों का उचित निर्वाह किया होता, तो मुस्लिम बहुल क्षेत्रों के लिए विकास परिषद बनाने की मांग न उठानी पड़ती।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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