नई दिल्ली, 13 नवंबर (आईएएनएस)। जयंती समारोहों के मौजूदा दौर में धर्मनिरपेक्षतावादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद की 127वीं जयंती लगभग भुला दी गई। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के कुछ अधिकारियों के अलावा मौलाना आजाद के जामा मस्जिद स्थित स्मारक पर कोई नहीं पहुंचा।
नई दिल्ली, 13 नवंबर (आईएएनएस)। जयंती समारोहों के मौजूदा दौर में धर्मनिरपेक्षतावादी नेता और स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद की 127वीं जयंती लगभग भुला दी गई। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के कुछ अधिकारियों के अलावा मौलाना आजाद के जामा मस्जिद स्थित स्मारक पर कोई नहीं पहुंचा।
आधुनिक भारत के संस्थापकों में से एक मौलाना आजाद को अधिकतर नेताओं ने याद नहीं किया। अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के बाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे मौलान आजाद। उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया जा चुका है।
आईसीसीआर मौलाना आजाद की जयंती को राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के रूप में मनाती है। ऐतिहासिक जामा मस्जिद के पास स्थित मौलाना आजाद के स्मारक पर आईसीसीआर ने समारोह का आयोजन किया। समारोह में आईसीसीआर के महानिदेशक सी. राजशेखर ने कहा कि विभाजन के बाद मौलाना आजाद ने मुसलमानों के सामने कुरान की यह बात रखी थी : “डरो मत और शोक मत मनाओ। अगर तुम्हारे पास सच है तो कामयाबी तुम्हारे साथ होगी।”
उन्होंने कहा कि 23 अक्टूबर 1947 को जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर मौलाना आजाद ने जो भाषण दिया था वह उनके धर्मनिरपेक्ष व्यक्तित्व और जिस बात के लिए वह लड़े उसका प्रतिबिंब था। राजशेखर ने कहा कि मौलाना आजाद आधुनिक पश्चिमी ज्ञान के प्रति उतने ही खुले थे जितना कि वह भारत पर पश्चिमी शासन के खिलाफ थे।
टिप्पणीकार और मौलाना आजाद के रिश्तेदार फिरोज अहमद बख्त ने कहा कि मौलाना आजाद सहिष्णुता और हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े अलंबरदार थे। उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि आईसीसीआर के अलावा बाकी सभी ने मौलाना आजाद को “भुला दिया और किनारे लगा दिया।”
उन्होंने कहा कि आज के समय में जब कुछ लोग भारत के महानतम धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को तबाह करने पर उतारु हैं, ऐसे में यह वक्त की मांग है कि मौलाना आजाद के संदेश को फैलाया जाए।
समारोह के संचालक और मुस्लिम न्यायशास्त्र के विद्वान बहार बर्की ने कहा कि आजाद की जिंदगी की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह भी थी कि भारतीय मुसलमानों के जीवन के हर क्षेत्र में सुधार किया जाए।
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