विहिप संरक्षक अशोक सिंघल का निधन (लीड-1)

नई दिल्ली, 17 नवंबर (आईएएनएस)। विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के संरक्षक अशोक सिंघल का मंगलवार को दोपहर 2.24 बजे निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। सांस लेने में परेशानी के कारण कुछ दिनों पहले उन्हें गुड़गांव के मेदांता मेडिसिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

उनका पार्थिव शरीर रात 10 बजे दिल्ली के झंडेवालान स्थित केशवकुंज (संघ कार्यालय) में अंतिम दर्शन के लिए ले जाया जाएगा।

विहिप के प्रवक्ता विनोद बंसल ने बताया कि दिवंगत नेता का पार्थिव शरीर बुधवार को दिल्ली में यमुना किनारे स्थित निगमबोध घाट ले जाया जाएगा, जहां शाम 4.30 बजे अंत्येष्टि की जाएगी।

अशोक सिंघल जीवनभर स्वयं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का समर्पित प्रचारक मानते रहे। नब्बे के दशक में चले श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के अगुवा रहे।

सिंघल का जन्म आश्विन कृष्ण पंचमी (27 सितंबर,1926) को उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ था। उनके पिता महावीर सिंघल शासकीय सेवा में उच्च पद पर थे। घर के धार्मिक वातावरण के कारण उनके मन में बालपन से ही हिंदू धर्म के प्रति प्रेम जाग्रत हो गया। उनके घर संन्यासी तथा धार्मिक विद्वान आते रहते थे। कक्षा नौ में उन्होंने महर्षि दयानंद सरस्वती की जीवनी पढ़ी। उससे भारत के हर क्षेत्र में संतों की समृद्ध परम्परा एवं आध्यात्मिक शक्ति से उनका परिचय हुआ।

वर्ष 1942 में प्रयाग में पढ़ते समय प्रो. राजेंद्र सिंह (रज्जू भैया) ने उनका संपर्क संघ से कराया। इसके बाद उन्होंने अपना जीवन संघ के लिए समर्पित करने का निश्चय कर लिया। बचपन से ही उनकी रुचि शास्त्रीय गायन में रही। संघ के कई गीतों की लय उन्होंने ही बनाई है। तब से वह संघ के हिंदुत्व एजेंडे पर काम करते रहे।

विहिप की विज्ञप्ति के मुताबिक, वर्ष 1947 में देश विभाजन के समय कांग्रेस के नेता जब सत्ता प्राप्ति की खुशी मना रहे थे, सिंघल इस सोच में पड़े थे कि ऐसे सत्तालोलुप नेताओं के हाथ में देश का भविष्य क्या होगा?

वर्ष 1948 में देश के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल ने जब संघ पर प्रतिबंध लगाया तब अशोक सिंघल ने सत्याग्रह किया और जेल गए। जेल से छूटने के बाद उन्होंने बी.ई. अंतिम वर्ष की परीक्षा दी और संघ के प्रचारक बन गए।

वर्ष 1975 से 1977 तक देश में आपातकाल और संघ पर प्रतिबंध रहा। आपातकाल के बाद वह दिल्ली के प्रांत प्रचारक बनाए गए। वर्ष 1981 में डॉ. कर्ण सिंह के नेतृत्व में दिल्ली में एक विराट हिंदू सम्मेलन हुआ, पर उसके पीछे शक्ति अशोक सिंघल और संघ की थी। उसके बाद सिंघल को विश्व हिंदू परिषद की जिम्मेदारी दी गई, जिसे वह आजीवन निभाते रहे।

पिछले कुछ समय से उनके फेफड़ों में संक्रमण हो गया था। उन्हें सांस लेने में परेशानी हो रही थी। उन्होंने गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में मंगलवार की दोपहर में अंतिम सांस ली।

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