नई दिल्ली, 19 जनवरी (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को लालकिला हमले के दोषी पाकिस्तानी लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की पुनरीक्षण याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई की अनुमति दे दी। आरिफ ने अपनी याचिका में खुली सुनवाई का आग्रह किया था। आरिफ ने 10 अगस्त, 2011 के उस अदालती फैसले के पुनरीक्षण की मांग की है, जिसमें 22 दिसंबर, 2000 को लालकिले पर आतंकी हमले के लिए उसे दी गई मौत की सजा को बरकरार रखा गया था।
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति टी.एस.ठाकुर, न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर, न्यायमूर्ति जे.चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति ए.के.सीकरी और न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन की संविधान पीठ ने आरिफ को एक महीने में ताजा पुनरीक्षण याचिका दायर करने की इजाजत दी। इसकी सुनवाई खुले में होगी।
शीर्ष अदालत ने आरिफ को 2011 के फैसले के पुनरीक्षण के लिए दायर याचिका में नए आधारों को जोड़ने की भी अनुमति दी।
दो सितंबर, 2014 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि जिन मामलों में उसके द्वारा मौत की सजा को बहाल रखा जाता है, उसमें दोषी को इस बात का हक हासिल है कि उसकी फैसले के पुनरीक्षण के लिए दायर याचिका की सुनवाई तीन न्यायाधीशों की पीठ खुले में करे।
अदालत ने कहा था कि मौत की सजा पाए दोषियों के लंबित मामलों में अगर पुनरीक्षण याचिका खारिज हो चुकी है, लेकिन उपचारात्मक याचिका (क्यूरेटिव पेटिशन) नहीं डाली गई है तो दोषी एक महीने के अंदर अपनी पुनरीक्षण याचिका की खुले में सुनवाई करने के लिए याचिका दे सकता है।
अदालत ने कहा था कि खुले में सुनवाई का अवसर मौत की सजा पाए उन दोषियों को नहीं मिलता, जिनकी पुनरीक्षण और उपचारात्मक, दोनों याचिकाएं खारिज हो चुकी हों।
आरिफ ने सितंबर 2014 के आदेश को वापस लेने का आग्रह किया। उसने कहा कि वह मौत की सजा पाने वाला अकेला ऐसा दोषी है, जिसे खुले में सुनवाई का अवसर नहीं मिला है, क्योंकि वह उस श्रेणी में आता है जिसमें दोषी की उपचारात्मक याचिका भी खारिज हो चुकी है।
अदालत ने अपने दो सिंतबर, 2014 के फैसले में आरिफ को यह कहते हुए अपवादित रूप से छूट देने का आदेश दिया कि इस फैसले की वजह से आरिफ का मामला ऐसा पहला मामला बन गया है, जिसमें उसे याचिका की खुले में सुनवाई का अधिकार नहीं मिल पा रहा है।
लालकिले पर हुए आतंकी हमले में राजपूताना राइफल्स के तीन जवानों की मौत हुई थी। आंतकी हमला कर भागने में कामयाब रहे थे।
इस मामले में आरिफ को दी गई मौत की सजा को सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखा था। 10 अगस्त, 2011 के अपने फैसले में अदालत ने लालकिले पर हमले को विदेशियों द्वारा भारत की अखंडता और संप्रभुता पर हमला बताया था। अदालत ने कहा था कि यह भारत माता पर हमला है।
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