नई दिल्ली, 25 जनवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को कहा कि अतीत के प्रति सम्मान राष्ट्रीयता का एक आवश्यक पक्ष है। उन्होंने कहा कि जब हिंसा की घृणित घटनाएं स्थापित आदर्शो पर चोट करती हैं तो उन पर उसी समय ध्यान देना होगा, और हिंसा, असहिष्णुता व अविवेकपूर्ण ताकतों से स्वयं की रक्षा करनी होगी।
नई दिल्ली, 25 जनवरी (आईएएनएस)। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सोमवार को कहा कि अतीत के प्रति सम्मान राष्ट्रीयता का एक आवश्यक पक्ष है। उन्होंने कहा कि जब हिंसा की घृणित घटनाएं स्थापित आदर्शो पर चोट करती हैं तो उन पर उसी समय ध्यान देना होगा, और हिंसा, असहिष्णुता व अविवेकपूर्ण ताकतों से स्वयं की रक्षा करनी होगी।
राष्ट्रपति ने 67वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संबोधन में कहा कि “हमारी उत्कृष्ट विरासत, लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिए न्याय, समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती हैं।”
उन्होंने कहा कि सामंजस्य, सहयोग और सर्वसम्मति बनाने की भावना निर्णय लेने का प्रमुख तरीका होना चाहिए, और निर्णय व कार्यान्वयन में विलम्ब से विकास प्रक्रिया का नुकसान होगा।
मुखर्जी ने कहा, “विवेकपूर्ण चेतना और हमारे नैतिक जगत का प्रमुख उद्देश्य शांति है। यह सभ्यता की बुनियाद और आर्थिक प्रगति की आवश्यकता है। परंतु हम कभी भी यह छोटा-सा सवाल नहीं पूछ पाए हैं : शांति प्राप्त करना इतना दूर क्यों है? टकराव समाप्त करने से अधिक शांति स्थापित करना इतना कठिन क्यों है?”
उन्होंने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय क्रांति के साथ 21वीं सदी एक ऐसा युग होगा, जिसमें लोगों और देश की सामूहिक ऊर्जा उस बढ़ती हुई समृद्धि के लिए समर्पित होगी, जो पहली बार घोर गरीबी के अभिशाप को मिटा देगी। “यह उम्मीद इस शताब्दी के प्रथम 15 वर्षो में फीकी पड़ गई है। इसकी प्रमुख वजह क्षेत्रीय अस्थिरता में चिंताजनक वृद्धि और आतंकवाद है।”
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