नई दिल्ली, 10 मार्च (आईएएनएस)। कोएलिशन फॉर अ जीएम-फ्री इंडिया के साथ ही स्वतंत्र वैज्ञानिकों ने कहा कि जीएम सरसों के लाभों को बढ़-चढ़ाकर पेश करने के लिए उसके परीक्षण में अनियमितता की गई है। इसके समर्थन में उन्होंने देश में रेपसीड और सरसों के बीज परीक्षण के मूल्यांकन का डेटा जारी किया और उसकी तुलना विवादित जीन परिवर्तित संकर सरसों डीएमएच-11 को लेकर प्रस्तुत और घोषित नतीजों से की।
जीन परिवर्तित संकर सरसों डीएमएच -11 के प्रतिकूल डेटा को संभवतया छिपाने के प्रयासों को सामने लाने वाले सबूत भी मीडिया के सामने प्रस्तुत किए गए। अलायंस द्वारा अन्य बेहतर विकल्पों की उपलब्धता के बारे में भी जानकारी दी गई।
धारा संकर सरसों (डीएमएच) को विकसित करने की राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) परियोजना के परीक्षण से नागपुर विश्वविद्यालय में सलाहकार के तौर पर संबद्ध रहे नेशनल अकादमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (एनएएएस) के फेलो डॉ. शरद पवार ने मीडिया प्रतिनिधियों से चर्चा करते हुए कहा, “पुराने नियंत्रकों या पुरानी किस्मों से डीएमएच-11 की तुलना करके फसल वैज्ञानिक अतिश्योक्तिपूर्ण फायदे दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं। इसकी तुलना डीएमएच-1 जैसी अन्य संकर किस्मों से नहीं की गई है। बल्कि जो नियंत्रक चुने गये वे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा अपनाये गये प्रोटोकॉल के अनुरूप नहीं थे।”
उन्होंने कहा, “यह प्रोटोकॉल एनएआरएस के भीतर ही अनेक वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। संभवतया इसकी वजह यही है क्योंकि ऐसा करने पर देश में इस वक्त उपलब्ध सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की सर्वश्रेष्ठ पैदावार वाली किस्मों या संकर किस्मों के मुकाबले डीएमएच-11 कहीं से भी बेहतर दिखाई नहीं देता। वास्तव में तो अगर किस्मों के मूल्यांकन में पौध प्रोत्साहन के दिशानिर्देशों का पालन किया जाता तो बहुत पहले 2006-07 में ही डीएमएच-11 को अगले चरण तक नहीं बढ़ना चाहिए था।”
कोएलिशन फॉर ए जीएम फ्री इंडिया की सह संयोजक कविता कुरुगंति ने कहा, “हमने आज यह प्रदर्शित किया है कि किस तरह से जीईएसी के निर्णय कुछ कहते हैं, वास्तविक अनुमतियां कुछ और कहती हैं और जो परीक्षण प्रोटोकॉल अपनाये जाते हैं वे पूरी तरह से अलग होते हैं। यह अब सभी पक्षों का स्पष्ट हो जाना चाहिये कि क्यों डेटा और परीक्षण परिणामों को सभी चरणों में साझा किया जाना जरूरी है।”
उन्होंने कहा, “इस संबंध में केन्द्रीय सूचना आयोग ने भी 2009 में आदेश दिया था और सर्वोच्च न्यायालय गठित टीईसी ने भी इसकी अनुशंसा की थी। अगर यह सिद्धांत अपनाया जाता तो डीएमएच-11 एक सर्वश्रेष्ठ किस्म के इस अग्रणी चरण तक किसी भी हालत में नहीं पहुंच पाता। बहुमूल्य सार्वजनिक धन बच जाता और इसका निवेश पैदावार वृद्धि के लिये सतत विकल्पों में किया जा सकता था।”
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