नई दिल्ली, 2 जून (आईएएनएस)। मराठवाड़ा से बुंदेलखंड के लिए 11 दिनों की जल-हल पदयात्रा के बाद स्वराज अभियान का कहना है कि इन इलाकों में सूखे के साथ पानी की कालाबाजारी से स्थिति बदतर हुई है। इसलिए सरकार को इस पर तत्काल रोक लगाने और पानी की टैंकरों की संख्या बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।
स्वराज अभियान के जय किसान आंदोलन, एकता परिषद, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय और जल बिरादरी द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित जल हल पदयात्रा की शुरुआत 21 मई को हुई, जिसका समापन 31 मई को हुआ। लगभग 250 किलोमीटर की पदयात्रा में जल बिरादरी के राजेंद्र सिंह, एकता परिषद के पीवी राजगोपाल, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. सुनीलम और स्वराज अभियान के योगेंद्र यादव ने भाग लिया।
स्वराज अभियान ने एक बयान में कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य सूखा राहत जनहित याचिका (स्वराज अभियान बनाम भारतीय संघ और अन्य, डब्ल्यू पी (सिविल) 857/2015) पर 13 मई को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के प्रति लोगों को जागरूक करना और सूखा पीड़ितों को उनके अपने अधिकार का बेहतर इस्तेमाल के लिए समर्थ बनाना था।
स्वराज अभियान का कहना है कि महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में गांव के लोग बाहरी और कभी-कभी मिलने वाली टैंकरों के पानी पर पूरी तरह से निर्भर हैं। दुर्भाग्य से इस जल संकट का इस्तेमाल बेलगाम मुनाफाखोरी के लिए हो रहा है। राजनीतिक संरक्षण वाले निजी टैंकर आपूर्तिकर्ताओं की चांदी है। बॉटलिंग प्लांट उग आए हैं और पानी की खुदरा बिक्री खूब हो रही है।
बुंदेलखंड की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। लेकिन यहां के लोग, विशेष रूप से मध्य प्रदेश के, पानी की कमी के साथ जीने को विवश हैं। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के गांवों में टैंकर आपूर्ति में वृद्धि करने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश में कुछ गांवों में पानी की बेहतर आपूर्ति की जरूरत है।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में स्पष्ट है कि खाद्य सुरक्षा के अंतर्गत सूखा प्रभावित क्षेत्रों में सभी को राशन दिया जाए चाहे उनके पास राशन कार्ड न हों तब भी। इस संबंध में सभी जगहों पर घोर असमानता देखने को मिली। महाराष्ट्र में कई घर ऐसे हैं जिनके पास राशन कार्ड नहीं है और उन्हें सब्सिडी वाला अनाज नहीं मिलता। जिनके पास राशन कार्ड हैं उनको भी तय की गई मात्रा में राशन नहीं मिलता और कुछ मामलों में बहुत ही घटिया अनाज दिया जाता है। वहीं, बुन्देलखंड में स्थिति कुछ बेहतर है, लेकिन अनियमित और अपर्याप्त अनाज-वितरण की शिकायतें भी मिली हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में यह साफ स्पष्ट है कि गर्मी की छुटियों में भी मिड डे मील दिया जाना चाहिए। इसके बाद राज्यों ने कागज पर आदेश जारी कर दिया है लेकिन जमीन पर बहुत ही सीमित प्रभाव है। लातूर, उस्मानाबाद और बीड के तीन जिलों में पदयात्रा मार्ग में आने वाले किसी भी गांव के स्कूल में छुट्टी की अवधि के दौरान मध्यान्ह भोजन दिए जाने की सूचना नहीं है।
सूखा प्रभावित आबादी को, विशेष रूप से गरीबों को रोजगार देने वाला मनरेगा सूखा से निपटने के लिए एक प्रभावी उपकरण है। अधिकांश गांवों में लगभग किसी के पास नौकरी-कार्ड नहीं था या उन्हें भुगतान नहीं मिला था जबकि सरकारी आंकड़ों में उन गांवों में नौकरी-कार्ड की बड़ी संख्या दिखाई गई है। यह स्पष्ट है कि इस योजना पर स्थानीय शक्तिशाली लोगों और नौकरशाहों द्वारा कब्जा कर लिया गया जो सूखा राहत के लिए बने पैसे को हजम कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश में भी मनरेगा का उपयोग करने का कोई प्रयास दिखाई नहीं दिया। उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड क्षेत्र, विशेष रूप से महोबा जिले में, एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मनरेगा का इस्तेमाल सूखा राहत के लिए किया गया। उप्र अपने अप्रैल-मई के रोजगार मानव दिवस के अपने लक्ष्य को पार कर गया है।
स्वराज अभियान द्वारा बताया गया कि कहीं भी राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से फसल नुकसान के मुआवजे के पूर्ण वितरण की बात सामने नहीं आई। उत्तर प्रदेश के किसान सबसे ज्यादा घाटे में हैं। पिछले तीन वर्षो में छह फसलों में से चार खोने वाले किसानों को कम से कम तीन फसल का मुआवजा भी नहीं दिया गया है।
भारतीय रिजर्व बैंक और नाबार्ड के दिशा-निदेशरें के अनुसार कृषि ऋण पुनर्गठन और पिछले ऋण के लंबित रहने के दौरान नए ऋण के लिए सूखा प्रभावित किसानों की पात्रता के बारे में स्थिति स्पष्ट होने के बावजूद किसी भी राज्य में यह नहीं हो रहा है।
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