भारत एनएसजी में चीन के समर्थन को लेकर आशावान (राउंडअप)

नई दिल्ली, 19 जून (आईएएनएस)। भारत ने रविवार को आशा जाहिर की कि परमाणु आपूतिकर्ता समूह (एनएसजी) में शामिल होने के प्रयास में उसे चीन का समर्थन मिल जाएगा और साथ ही पाकिस्तान के संबंध में कहा कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।

सुषमा ने यहां संवाददाताओं से कहा, “हम चीन को भी मनाने में कामयाबी हासिल कर लेंगे।”

उन्होंने कहा, “चीन 48 सदस्य देशों वाले एनएसजी में भारत के प्रवेश के खिलाफ नहीं है, लेकिन वह केवल मानक प्रक्रियाओं की बात कर रहा है।”

पाकिस्तान के भी एनएसजी सदस्यता हासिल करने की कोशिश के बारे में एक सवाल के जवाब में विदेश मंत्री ने कहा, “देखिए, भारत समूह का सदस्य नहीं है। लेकिन हम किसी अन्य देश के एनएसजी में प्रवेश का विरोध नहीं करेंगे। हम केवल यह चाहते हैं कि सभी आवेदनों पर योग्यता के आधार पर फैसला हो।”

सुषमा ने हालांकि मानक के मुद्दे पर बीजिंग का विरोध करते हुए कहा, “हमारे मामले में मानक की बात करने की जगह, संबंधों पर बात होनी चाहिए।”

भारत-पाकिस्तान के संबंधों पर सवालों के जवाब में उन्होंने भारत और पाकिस्तान के संबंधों को बेहद ‘जटिल’ करार दिया और कहा कि वार्ता और आतंकवाद साथ-साथ संभव नहीं है।

सुषमा ने हालांकि दोनों देशों के मौजूदा प्रधानमंत्रियों के बीच सहज तालमेल बताया। उन्होंने कहा, “दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों (नरेंद्र मोदी और उनके पाकिस्तानी समकक्ष नवाज शरीफ) के संबंधों में जैसी सहजता और गर्माहट है, वैसी पहले कभी नहीं देखी गई। समस्याएं सुलझाने के लिए आपका रिश्ता अच्छा होना चाहिए।”

उन्होंने हालांकि कहा, “सौहार्द्रपूर्ण संबंधों के लिए हम राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को नजरअंदाज नहीं करेंगे।”

स्वराज ने कहा कि पाकिस्तान के प्रति भारत का रवैया तीन प्रमुख बिंदुओं पर आधारित है -सभी समस्याएं बातचीत के जरिए हल हों, किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप न हो और आतंकवाद और वार्ता साथ साथ संभव नहीं है।

सुषमा ने कहा, “हमारी सरकार इन तीनों पहलुओं पर सफल रही है।”

सुषमा ने इससे भी इनकार किया कि मोदी सरकार की विदेश नीति में दक्षिण एशिया को खास तवज्जो नहीं दी जा रही है।

वर्ष 2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप के बाद भारत की ओर से दी गई मदद के संदर्भ में उन्होंने कहा, “पिछले दो वर्षो में भारत पड़ोसी देशों के लिए संकट के वक्त एक मजबूत सहयोगी व मित्र के रूप में उभरा है।”

विदेश मंत्री ने प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि इसके कई फायदे हैं।

सुषमा ने कहा कि विदेश यात्राओं के कारण स्मार्ट शहर जैसी परियोजनाओं में अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों से सहायता मिली है।

सुषमा ने कहा, “गत दो साल में 55 अरब डॉलर या 3,69,000 करोड़ रुपये का एफडीआई आया। यह संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल की तुलना में 43 फीसदी अधिक है।”

सुषमा ने इस बात से भी इंकार किया कि अमेरिका के साथ उसके मजबूत होते रिश्ते का रूस और चीन जैसे अन्य देशों से उसके संबंधों पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

उन्होंने साथ ही स्पष्ट किया कि इसके कारण गुट निरपेक्ष आंदोलन (नाम) जैसे मंचों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता भी कम नहीं होगी।

सुषमा ने कहा, “यह सच है कि हमने अभी अमेरिका के साथ बातचीत बढ़ा दी है। लेकिन इसका रूस और चीन के साथ हमारे रिश्ते पर असर नहीं पड़ेगा। और न ही भारत-अमेरिका के मजबूत होते रिश्ते का हमारे राष्ट्रीय हितों पर असर होगा।”

स्वराज ने माल्या प्रकरण में भी सफाई दी। उन्होंने कहा कि लंदन के पुस्तक विमोचन समारोह में भगोड़ा घोषित उद्योगपति विजय माल्या की मौजूदगी में ब्रिटेन स्थित भारतीय उच्चायुक्त नवतेज सरना की कोई गलती नहीं है।

सुषमा ने कहा, “उनका कोई दोष नहीं है।” मंत्रालय ने कहा है कि माल्या वास्तव में लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स एंड पॅलिटिकल साइंस के आमंत्रित लोगों की सूची में नहीं थे।

सुषमा ने कहा, “जैसे ही उच्चायुक्त ने माल्या को देखा, वह वहां से निकल गए। इसलिए मैं नहीं समझती कि इसे लेकर कोई विवाद है।”

हालांकि माल्या ने कई ट्वीट कर दावा किया है कि वह बिना बुलाए घुस जाने वालों में से नहीं हैं।

माल्या की उस कार्यक्रम में उपस्थिति को लेकर विवाद शुरू हो गया है, क्योंकि शराब कारोबारी को मुंबई की एक अदालत ने भगोड़ा घोषित कर दिया है।

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