नई दिल्ली, 20 जून (आईएएनएस)। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को बिहार, उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश में नील गाय, जंगली सुअर तथा बंदरों को मारने से संबंधित केंद्र सरकार की अधिसूचना पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।
न्यायालय ने हालांकि इस संबंध में याचिका दायर करने वाले एक पशु अधिकार कार्यकर्ता और दो अन्य संगठनों को अधिसूचना की ‘खामियों’ के संबंध में केंद्र सरकार से संपर्क करने की अनुमति दी है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति ए.एम. खानविल्कर की अवकाश पीठ ने केंद्र सरकार से भी कहा कि वह दो सप्ताह के भीतर शिकायतों पर जवाब दे। न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 15 जुलाई की तिथि निश्चित की है।
न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं से इस संबंध में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से संपर्क करने को कहा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि उक्त तीनों प्रजाति के जानवरों को जंगली क्षेत्र में नहीं मारा जाएगा।
न्यायालय ने तीनों याचिकाओं के आधार पर केंद्र तथा अन्य को नोटिस जारी करने से मना कर दिया। न्यायमूर्ति गोयल ने कहा, “हम नोटिस नहीं जारी करना चाहते।”
इससे पहले वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने सर्वोच्च न्यायालय की अवकाश पीठ से इस मामले में नोटिस जारी करने का आग्रह किया था।
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने एक दिसंबर, 2015, तीन फरवरी, 2016 और 24 मई, 2016 को तीन अलग-अलग अधिसूचनाएं जारी कर बिहार के कुछ जिलों में नील गाय, उत्तराखंड में जंगली सुअर और हिमाचल प्रदेश में बंदरों को एक साल के लिए ‘फसल को नुकसान पहुंचाने वाला’ घोषित किया था।
हंसारिया ने याचिका में कहा था कि केंद्र को इस संबंध में दो अन्य अधिसूचना जारी करने से रोका जाना चाहिए। हालांकि पीठ ने इससे भी मना कर दिया।
न्यायमूर्ति खानविल्कर ने कहा, “यदि उनके पास इसके अधिकार हैं तो वे अधिसूचना जारी कर सकते हैं। यह कितना सही है, इसे हम देखेंगे।”
इस संबंध में जनहित याचिका पशु अधिकार कार्यकर्ता गौरी मॉलेखी, वाइल्डलाइफ रेस्क्यू एंड रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन तथा फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल्स प्रोटेक्शन ऑर्गेनाइजेशंस की ओर से दायर की गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 62 की संवैधानिक वैधता को भी चुनौती दी, जिसके तहत उक्त तीनों अधिसूचनाएं जारी की गईं हैं।
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