पटना, 27 जून (आईएएनएस)। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह ने यहां सोमवार को कहा कि देश के पूर्वी क्षेत्रों में 41 लाख हेक्टेयर भूमि जलमग्न या अत्याधिक नमी वाली है, जहां पर फसलों की पैदावार शून्य है, इस पर ध्यान देने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि अगली हरित क्रांति पूर्वोत्तर राज्यों से ही होगी।
पूर्वी क्षेत्र के लिए पटना स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में आयोजित दूसरी हरित क्रांति की संचालन समिति की आयोजित बैठक में सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों के बीच तालमेल के साथ-साथ सफलतापूर्वक क्रियान्वयन एवं निगरानी के द्वारा द्वितीय हरित क्रांति के क्षेत्र में पूर्वी राज्यों में और तीव्रता लाई जा सकती है।
कृषि मंत्री ने आग्रह किया कि पूर्वी क्षेत्र में कृषि विकास कार्य को गति प्रदान की जाए, जिससे ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ के सपने को साकार किया जा सके।
बैठक में दूसरी हरित क्रांति में हो रहे कामों की समीक्षा एवं उसमें आने वाली विभिन्न कठिनाइयों से अवगत कराने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) के पूर्वी अनुसंधान परिसर को दायित्व सौंपा गया है।
उन्होंने कहा कि पूर्वी राज्य अभी भी चावल, सब्जी एवं मीठे जल की मछलियों के उत्पादन में 50, 45 और 38 प्रतिशत की भागीदारी कर रहा है, परंतु कृषि के विकास के माध्यम से पूर्वी क्षेत्र दूध, मांस, दलहन, तिलहन के उत्पादन में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
राधामोहन ने जलवायु परिवर्तन का खेती पर बुरे असर को ध्यान में रखते हुए खास शोध एवं कार्य योजनाओं की जरूरत पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, “जलवायु परिवर्तन का पूर्वी भारत की कृषि पर बहुत ज्यादा बुरा असर पड़ेगा। ऐसे में जलवायु स्मार्ट तकनीकों जैसे कम अवधि वाली प्रजातियों, जीरो टिलेज, धान की सीधी बिजाई, उथली क्यारियों पर पौधरोपण, पौलीहाउस व नेटहाउस में खेती, लेजर समतलक, हरी एवं भूरी खाद, जैविक खाद आदि को अधिक बढ़ावा देने की जरूरत है।”
बैठक में सभी पूर्वी राज्यों के कृषि से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उपमहानिदेशक (फसल प्रभाग), डॉ. जे.एस. संधू सहित कई कृषि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने हिस्सा लिया।
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