ज्वाला-अश्विनी के लिए ओलम्पिक पदक जीतना मुश्किल : माथिअस बोए (साक्षात्कार)

नई दिल्ली, 2 फरवरी (आईएएनएस)। दुनिया के अग्रणी पुरुष युगल वर्ग के बैडमिंटन खिलाड़ी माथिअस बोए का मानना है कि ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा की शीर्ष भारतीय महिला जोड़ी के लिए रियो ओलम्पिक में पदक जीतना काफी मुश्किल होगा।

नई दिल्ली, 2 फरवरी (आईएएनएस)। दुनिया के अग्रणी पुरुष युगल वर्ग के बैडमिंटन खिलाड़ी माथिअस बोए का मानना है कि ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा की शीर्ष भारतीय महिला जोड़ी के लिए रियो ओलम्पिक में पदक जीतना काफी मुश्किल होगा।

बोए ने हालांकि दूसरी विश्व वरीयता प्राप्त भारतीय स्टार सायना नेहवाल के पदक जीतने की उम्मीद जरूर व्यक्त की है।

सायन नेहवाल के बाद बैडमिंटन में भारत के लिए पदक जीतने की सर्वाधिक उम्मीदें ज्वाला-अश्विनी पर ही टिकी हुई हैं।

बोए से जब पूछा गया कि क्या भारत ओलम्पिक में युगल मुकाबलों में पदक जीत सकता है तो उन्होंने कहा, “नहीं, महिला युगल में ज्वाला-अश्विनी से बेहतर जोड़ियां मौजूद हैं। वह विश्व की शीर्ष 8-9 जोड़ियों से काफी पीछे हैं लेकिन वह उलटफेर कर सकती हैं। उन्हें सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए कम से कम दो शीर्ष जोड़ियों को हराना होगा.. जो निश्चित तौर पर काफी कठिन है।”

विश्व की शीर्ष 25 मिश्रित युगल जोड़ियों में भारत की एक भी जोड़ी शामिल नहीं है। महिला युगल में राष्ट्रमंडल खेलों की चैम्पियन जोड़ी ज्वाला-अश्विनी के अलावा भारत की कोई और जोड़ी शीर्ष 25 में नहीं है। वहीं पुरुष युगल में शीर्ष 25 में भारत के मनु अत्री और बी. सुमित रेड्डी की जोड़ी मौजूद है।

बोए ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “पुरुष युगल में मनु और सुमित कई अग्रणी जोड़ियों को हरा चुके हैं लेकिन सेमीफाइनल तक पुहंचने के लिए उन्हें 2-3 शीर्ष जोड़ियों को हराना पड़ेगा। खेल में कुछ भी असंभव नहीं है इसलिए यह हो सकता है। अगर कुछ विशेषज्ञ खेल को समझ कर परिणाम बता सकते हैं तो खेलने का कोई फायदा नहीं है। इसलिए यह मुमकिन है लेकिन काफी मुश्किल है क्योंकि युगल मुकाबलों में कड़ी स्पर्धा है।”

पूर्व नंबर एक रह चुके बोए ने कहा कि एकल मुकाबलों में भारत के अच्छे प्रदर्शन और युगल में इसके विपरीत परिणामों का कारण राष्ट्रीय टीम के मुख्य कोच पुलेला गोपीचंद हैं।

उन्होंने हालांकि इसके लिए गोपीचंद को जिम्मेदार नहीं ठहराया है और कहा है कि अगर वह गोपीचंद की जगह होते तो वही करते जो गोपीचंद कर रहे हैं।

बोए ने कहा, “गोपीचंद भारतीय बैडमिंटन में बड़ा स्थान रखते हैं। भारत को बैडमिंटन में इस मुकाम पर वापस लाने में उनका बुहत बड़ा योगदान है। एकल मुकाबलों में उनकी खेल की समझ लाजवाब है, इसलिए यह स्वाभविक है कि वह एकल मुकाबलों से शुरुआत करें। अगर मुझे किसी नए देश में नई शुरुआत करनी होती तो मैं भी पुरुष युगल से ही करता क्योंकि मैं पुरुष युगल को बेहतर तरीके से को समझता हूं। यही भारत के साथ हुआ है।”

भारत को बैडमिंटन में एकमात्र ओलम्पिक पदक 2012 में हुए लंदन ओलम्पिक में सायना नेहवाल ने दिलाया था। हालांकि अब भारत के पदक दावेदारों की सूची में पी.वी. सिंधु, किदाम्बी श्रीकांत और जूनियर श्रेणी में विश्व नंबर एक सिरिल वर्मा शामिल हो चुके हैं।

बोए ने हालांकि इस बात पर जोर दिया कि बैडमिंटन एकल मुकाबलों तक सीमित नहीं है।

उनहोंने कहा, “बैडमिंटन में युगल मुकाबलों का भी काफी महत्व है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पुरुष एकल के अलावा पुरुष युगल मुकाबलों को काफी तवज्जो दी जाती है।”

बोए ने कहा कि समय के साथ भारत युगल मुकाबलों में भी मजबूत हो जाएगा।

उन्होंने कहा, “यह सब समय के साथ होगा। विश्व स्तर का बैडमिंटन खिलाड़ी बनने के लिए कड़ी मेहनत की जरूरत होती है। आपको काफी पहले से इसकी शुरुआत करनी होती है। घंटो पसीना बहाना पड़ता है और ऐसे खिलाड़ियों की जरूरत होती है जो शीर्ष पर पहुंचने के लिए अपना सबकुछ दाव पर लगाने को तैयार हों और आपके पास प्रतिभा भी होनी चाहिए।”

उन्होंने कहा, “यह काफी लंबी प्रक्रिया है लेकिन दूसरे खेलों की तरह पांच साल में हासिल करने वाली चीज नहीं है, इसमें पीढ़ियां लग जाती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भारत विश्व स्तर के खिलाड़ी नहीं बना सकता, लेकिन इसमें समय लगेगा।”

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