नई दिल्ली, 25 नवंबर (आईएएनएस)। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मामलों के राज्य मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का मानना है कि पेरिस की जलवायु परिवर्तन वार्ता को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि विकसित देश अपनी कथनी को करनी में बदलें।
नई दिल्ली, 25 नवंबर (आईएएनएस)। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मामलों के राज्य मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का मानना है कि पेरिस की जलवायु परिवर्तन वार्ता को सफल बनाने के लिए जरूरी है कि विकसित देश अपनी कथनी को करनी में बदलें।
जावडेकर ने आईएएनएस के साथ खास मुलाकात में कहा कि चार मुद्दे ऐसे हैं जिन पर अमेरिका और पश्चिमी देशों को नरमी दिखानी होगी। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हुआ तो फ्रांस के राष्ट्रपति के शब्दों में कहेंगे कि “पेरिस असफल हो सकता है।”
जावड़ेकर ने कहा कि पेरिस वार्ता, जिसे कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी-21) भी कहा जाता है, की इन चार बातों में वैश्विक तापमान को दो फीसदी से अधिक नहीं बढ़ने देने का समझौता, जलवायु परिवर्तन पर सभी देशों के द्वारा किए गए वायदों की निगरानी का तंत्र, जलवायु कोष (ग्रीन फंड) के लिए हर साल 100 अरब डॉलर इकट्ठा करने के ठोस उपाय और विकसित देशों से विकासशील देशों को प्रौद्योगिकी का स्थानांतरण शामिल है।
जावड़ेकर से पूछा गया कि आर्थिक मंदी से निकल रहे विकसित देश धन देने के लिए कैसे राजी होंगे। जवाब में उन्होंने कहा, “उन्हें (विकसित देशों को) विकास की तलाश में धरती को प्रदूषित करने की अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी माननी होगी। फिर, उन्होंने खुद ही धन देने का वादा किया है। यह कोई नई बात नहीं है। यही वजह है कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने चेतावनी दी है कि अगर धन देने और प्रौद्योगिकी स्थानांतरण के मामले में अपनी ही बात पर पश्चिमी देशों ने अमल नहीं किया तो पेरिस वार्ता के सफल होने की गारंटी नहीं है।”
पर्यावरण संकट से निपटने की भारत की प्रतिबद्धता पर जावड़ेकर ने कहा, “हम केवल प्रौद्योगिकी आधारित उपायों पर ही केंद्रित नहीं हैं। हम जागरूकता भी फैला रहे हैं। हर जगह दक्षता को बढ़ा रहे हैं। उत्सर्जन और ऊर्जा की गहनता को घटा रहे हैं। इसके लिए आने वाले सालों में खरबों डॉलर लगेंगे। ऐसे में सभी को ध्यान में रखना होगा कि हमारी अर्थव्यवस्था 2030 तक 80 खरब से 100 खरब की होगी। इसलिए इन सब खर्चो को ध्यान में रखना होगा। अंतत: हम हवा, पानी, पर्यावरण और ऊर्जा को शुद्ध करना चाहते हैं तथा अधिक जंगल चाहते हैं।”
सौर ऊर्जा गठबंधन के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में जावड़ेकर ने कहा कि “यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विचार है। उनका मानना है कि अगर पेट्रोलियम पदार्थ के उत्पादक अपने सामान बेचने के लिए ‘ओपेक’ के झंडे तले एक हो सकते हैं तो फिर क्यों नहीं कर्क और मकर रेखा पर पड़ने वाले वे 54 देश एक साथ आ सकते, जिनके पास सूरज का अकूत प्रकाश है। ये साथ आएंगे और शोध में भी एक-दूसरे की मदद करेंगे। हमने कई और देशों को इसमें शामिल होने का न्योता दिया है। इसकी शुरुआत 30 नवंबर को की जाएगी।”
अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने कहा है कि पर्यावरण वार्ता में भारत एक चुनौती होगा। यह पूछने पर कि केरी ने ऐसा क्यों कहा, जावडेकर ने जबाव दिया, “हम पहले भी कह चुके हैं कि यह बयान ठीक नहीं है। यह असत्य है, भड़काऊ और अन्यायपूर्ण है। अगर कोई चुनौती है भी तो वह पश्चिमी देशों का रवैया है। चुनौती जॉन केरी का रवैया है। हमें विकासशील देशों का समर्थन हासिल है। इनमें कुछ सबसे कम विकसित देश भी हैं। भारत को पेरिस में किसी भी समझौते को मानने के लिए धमकाया नहीं जा सकता। हममें लचीलापन है, लेकिन समझ भी है।”
इस सवाल पर कि क्या चीन, भारत और अन्य विकासशील देशों के साथ है, जावड़ेकर ने कहा कि “अभी तक तो हां। यहां तक कि सीओपी-21 से पहले की बैठक में इसी माह उसने कहा कि वह पूरी तरह भारत के साथ है। हमें पता है कि सभी देशों के अपने हित होते हैं, लेकिन अभी तक हममें कोई मतभेद नहीं है।”
क्या पेरिस में अमेरिका के नेतृत्व में विकसित देशों और भारत के नेतृत्व में विकासशील देशों के बीच तनातनी संभव है? जावड़ेकर ने कांग्रेस शासन के खिलाफ जयप्रकाश नारायण के ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ के नारे का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मतलब यह कि विकासशील देश आ रहे हैं, कृपया कार्बन स्पेस खाली कर दें। हम सभी ने पेरिस में हक की आवाज उठाने के लिए कमर कस ली है।
पेरिस में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन 30 नवंबर से शुरू होगा। इसमें 190 देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
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