अखिल भारतीय प्रधान संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष जितेंद्र चौधरी ने कहा, “अखिलेश सरकार ने अभी तक प्रधानों के हित में कोई उचित कदम नहीं उठाया है। उन्होंने कहा कि 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन किया गया था, जिसके तहत 29 विषय ग्राम पंचायतों के अधीन कर दिए गए थे। पर यह अधिकार प्रधानों को अभी तक प्राप्त नहीं हुए हैं।”
चौधरी ने कहा, “देशभर में समान पंचायती राज व्यवस्था लागू नहीं है। सांसदों को दिया जाने वाला मानदेय लोकसभा सचिवालय के सचिव से एक रुपये अधिक निर्धारित है। इस तरह प्रधानों को ग्राम पंचायत अधिकारी से एक रुपए अधिक यानी 30001 रुपये वेतन दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सेवाकाल के बाद 10 हजार रुपए पेंशन तथा आकस्मिक निधन पर 20 लाख रुपये मुआवजा प्रधान के परिजनों को दिये जाने की मांग की।”
कहा, “वर्ष 2011 में कराई गई सामाजिक, आर्थिक गणना में 90 प्रतिशत पात्र व्यक्तियों को शामिल नहीं किया गया। इससे वह योजनाओं के लाभ से वंचित हो रहे हैं। उन्होंने दोबारा यह सर्वे कराये जाने की मांग उठाई।”
प्रदेश अध्यक्ष रामसेवक यादव ने कहा, “14वें वित्त आयोग की धनराशि से 50 हजार रुपए तक की कार्य योजना मंजूर किए जाने की सीमा कतई उपयुक्त नहीं है। उन्होंने कहा कि इससे अधिक धनराशि खर्च किए जाने के लिए ग्राम पंचायत को एडीओ से लेकर जिलाधिकारी तक अनुमति लेनी होती है। जो पंचायती राज अधिनियम की मंशा के विपरीत है।”
प्रदेश प्रभारी इंद्रपाल सिंह ने कहा, प्रधान 20 जून के शासनादेश से काफी नाराज हैं, जिसमें सरकार ने पंचायत चुनाव में हारे हुए प्रत्याशी को समिति का उपाध्यक्ष बनाए जाने का जो आदेश किया है, ऐसे आदेश की कल्पना लोकतंत्र में नहीं की जानी चाहिए।
उन्होंने सभी 36 विधान परिषद सीटों पर पंचायत चुनाव में विजयी प्रतिनिधियों को भी प्रत्याशी बनाए जाने पर जोर दिया। एक सितंबर से ग्राम स्वराज जागृत अभियान चलाया जा रहा है, जो 75 जिलों से होकर लखनऊ पहुंची है।”
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