भोपाल, 2 सितम्बर (आईएएनएस)। स्टॉकहोम वाटर प्राइज से पुरुस्कृत राजेंद्र सिंह ने बुंदेलखंड में कम बारिश के कारण तालाब और नदियों में पानी की स्थिति पर कहा है कि उन्होंने बीते साढ़े तीन दशक में सितंबर माह में बुंदेलखंड जैसा सूखा देश के किसी और हिस्से में नहीं देखा है। आने वाला समय इंसान के साथ जानवरों के लिए भी संकटकारी होगा, जिसकी आहट अभी से सुनाई देने लगी है।
भोपाल, 2 सितम्बर (आईएएनएस)। स्टॉकहोम वाटर प्राइज से पुरुस्कृत राजेंद्र सिंह ने बुंदेलखंड में कम बारिश के कारण तालाब और नदियों में पानी की स्थिति पर कहा है कि उन्होंने बीते साढ़े तीन दशक में सितंबर माह में बुंदेलखंड जैसा सूखा देश के किसी और हिस्से में नहीं देखा है। आने वाला समय इंसान के साथ जानवरों के लिए भी संकटकारी होगा, जिसकी आहट अभी से सुनाई देने लगी है।
बुंदेलखंड प्रवास पर आए राजेंद्र ने फोन पर आईएएनएस से कहा, “बुंदेलखंड में कम वर्षा के कारण एक तरफ खेतों में फसल लगभग बर्बादी की ओर जा रही है, तो तालाब और नदियों की हालत बरसात के मौसम में मई-जून जैसी है। लोगों ने काम की तलाश में अभी से पलायन शुरू कर दिया है। अगर मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारें अभी से नहीं जागीं तो इस इलाके में मार्च अप्रैल में क्या हाल होगा, इसका अंदाजा किसी को नहीं है।”
बुंदेलखंड के एक दर्जन से ज्यादा गांवों का भ्रमण करने के बाद राजेंद्र ने कहा, “यह वह इलाका है, जो दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला हुआ है। दोनों राज्यों के 13 जिलों का हाल लगभग एक जैसा है। सितंबर माह में आमतौर पर सभी तालाब लबालब नजर आने लगते हैं, तो नदियां उफान पर होती हैं। मगर यहां ऐसा नहीं है। टीकमगढ़ के कुंडेश्वर के पास की नदी जमड़ार तो सूखी नजर आ रही है, मोहनगढ़ के तालाब का यही हाल है।”
उन्होंने जामनी नदी से तालाब भरने के लिए बनाई गई नहरों का जिक्र करते हुए कहा कि इन नहरों के निर्माण में काफी तकनीकी खामियां हैं। “मसलन तालाबों तक पानी पहुंचाने के लिए नहर नदी से नीचे की ओर होनी चाहिए। इससे नहर के लिए कम खुदाई करनी होती है और पानी आसानी से आगे बढ़ जाता है। मगर यहां नहर ऊंचाई पर और बहुत गहरी बनी हुई है। कुल मिलाकर कहा जाए तो सरकारी पैसे की बंदरबांट हुई है।”
राजेंद्र ने ग्रामीणों द्वारा सुनाए गए हालातों का ब्यौरा देते हुए कहा, “लोग अभी से पलायन करने लगे हैं। आमतौर पर इस इलाके में पलायन दीपावली के बाद हुआ करता था। लेकिन काम है नहीं, रोटी का इंतजाम मुश्किल हो गया है, काम की तलाश में पलायन न करें तो क्या करें। किसी भी इलाके में पलायन बेकारी, लाचारी, बीमारी के चलते होता है, मगर यहां सूखा के कारण यह हाल बन रहे हैं।”
‘जलपुरुष’ राजेंद्र बुंदेलखंड के हालात को लेकर उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश सरकारों के रवैये से खुश नहीं हैं।
उनका कहना है, “इस इलाके के सूखे को सरकारों को जिस नजर से देखना चाहिए, वैसा हो नहीं रहा है, बल्कि उसे नजरअंदाज किया जा रहा है। दोनों सरकारों को चाहिए कि वे इस इलाके के सूखे से निपटने के लिए जल्द कदम उठाएं, नहीं तो आने वाला समय इंसान और जानवर दोनों के लिए मुसीबत भरा होने वाला है।”
पानी सरंक्षण के क्षेत्र में बीते साढ़े तीन दशकों से काम कर रहे राजेंद्र का मानना है कि उन्होंने सितंबर माह में इतनी भयावह स्थिति देश के किसी दूसरे हिस्से में नहीं देखी। “हालात डरावने हैं, क्योंकि जहां फसल मुश्किल से पांच से 10 प्रतिशत बची है, पानी की कमी है और लोगों के पास काम नहीं हैं। वहां आगे क्या होगा, यह उस क्षेत्र में जाकर ही समझा जा सकता है। जब सितंबर में यह आलम है तो मार्च-अप्रैल का अंदाजा लगाया जा सकता है।”
राजेंद्र ने मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सरकारों को सुझाव दिया है कि वे यहां के सूखे को गंभीरता से लें, तालाबों को बचाएं, नदियों को प्रवाहमान बनाएं और तालाबों में जाने वाले गंदे पानी को रोकें। जरूरत पड़ने पर नदियों से पानी पाईप लाइन के जरिए तालाबों तक लाएं। बुंदेलखंड के चंदेल काल में नदियों से तालाबों को ही तो जोड़ा गया था, जिसके चलते यह इलाका पानीदार हुआ करता था, उस धरोहर को भी सरकारें बचाने में नाकाम रही हैं, यह अफसोसजनक है।
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