मध्यप्रदेश छिंदवाड़ा शहर में हुए लोमहर्षक काण्ड से पीड़ित और शर्मिंदा है,अभी तक 23 नौनिहालों की जानें जा चुकी हैं,मप्र के मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने उनके कार्यकाल में पहला ऐसा मामला सामने आया जिसने उनके प्रशासनिक प्रबंधन की धज्जियाँ उड़ा दीं,जनता को यह समझ आ गया की पर्ची वाले सीएम के नाम से मशहूर मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल में अपने विभाग द्वारा सिर्फ छवि बनाने में मशगूल रहे,वे चौक-चौराहों पर उदघाटन समारोहों में व्यस्त रहे.
दरअसल मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री जो सूबे के उप-मुख्यमंत्री भी हैं इस दर्दनाक हत्यायों के सीधे जिम्मेदार हैं जब पूर्व में हमने स्वास्थ्य विभाग की जांच में पाया था की वहां के अधिकारी और कर्मचारी लगामहीन थे,जब हमने स्वास्थ्य मंत्री के ओएसडी श्री गोहल से इस सम्बन्ध में बात की थी तब उन्होंने माना था की यह कमी है और वे मंत्री जी को इस हेतु अवगत करवाएंगे लेकिन तब तक इतना बड़ा काण्ड हो गया जो न निगलते बन रहा न उगलते।
मुख्यमंत्री का सरकारी प्रचार अमला किसी तरह उनके बयानों को प्रसारित कर बिगड़ी छवि बचाने के प्रयास में है लेकिन सत्य तो सत्य रहेगा,मप्र आज किसानों की दुर्दशा,स्वास्थ्य समस्याएं,बदहाल कानून व्यवस्था और बेलगाम प्रशासनिक तंत्र से जूझ रहा है,वरिष्ठ अधिकारी कोई सुनवाई नहीं करते,पत्रकारों की नौकरियां समाप्त करवाई जाती हैं ,मुख्यमंत्री पर आरोप हैं उन्होंने पद संभालते ही सबसे पहले पुराने संबंधों के चलते कई पत्रकारों को नेस्तनाबूत किया,कईओं की सूची निकलवा उनका मान-मर्दन करने का प्रयास किया और अपने पद की ताकत के मद में वे मदमस्त हो मुख्यमंत्री पद के दायित्व को भूल गए.
मुख्यमंत्री मोहन यादव जहरीली दवा का ठीकरा तमिलनाडु सरकार पर फोड़ रहे हैं,वे इतने भोले मुख्यमंत्री हैं की उन्हें यह भी नहीं पता की दवा कंपनी से दवा लेने से पूर्व या समय मप्र सरकार भी जांच करवाती है उस जांच रिपोर्ट का क्या हुआ ? स्वास्थ्य मंत्री से क्या सवाल किये गए?क्या उनका कोई दायित्व नहीं था ?
मुख्यमंत्री का बयान है जैसे ही तमिलनाडु सरकार से मैनुफेक्चरिंग रिपोर्ट आयी उस दवा को बैन किया गया,अरे साहब या सब तो काण्ड होने पर हुआ,आपके इतने बड़े अमले ने क्या जांच की ?यदि हाँ तो उनकी रिपोर्ट कैसे सही आयी ,या गलत आयी तो दवा बैन क्यों नहीं हुई ?
मुख्यमंत्री ने अपनी जिम्मेदारी हटाने के उद्देश्य से राहुल गांधी को तमिलनाडु सरकार के विरुद्ध धरना देने का सुझाव दे डाला लेकिन मुख्य यह है हमारी जांच का क्या हुआ ?क्या हमने जांच नहीं की ?
मध्य प्रदेश पुलिस की एसआईटी ने जहरीली दवा बनाने वाली कंपनी के मालिक रंगनाथन को चेन्नई से गिरफ्तार कर लिया.यह उचित कदम है लेकिन हमारे यहाँ के दोषी अधिकारी क्यों खुले घूम रहे,ड्रग कंट्रोलर और उनके अधीनस्थ अमले पर अभी तक आपराधिक मुकदमा क्यों नहीं हुआ,पहले उनकी गिरफ्तारी होनी थी ,स्वास्थ्य मंत्री का इस्तीफ़ा क्यों नहीं लिया गया ,मुख्यमंत्री उन्हें बचाने में लगे हैं या स्पष्ट देखने में आ रहा है.
इतने बड़े मप्र में दवा सैम्पल जांच की मात्र 3 लैब हैं,29 सितंबर को भेजे गए कोल्ड्रिफ सिरप में इस्तेमाल होने वाली ड्रग की जांच अभी तक पेंडिंग है.गौरतलब है मध्य प्रदेश में अमानक दवाइयों पर प्रतिबंध लगाने के लिए डाक्टर्स आंदोलन तक कर चुके हैं, लेकिन प्रदेश का ड्रग कंट्रोल सिस्टम इतना लाचार है कि एक जांच रिपोर्ट को तैयार करने में उसके पसीने छूट जाते हैं. वजह है ड्रग कंट्रोल सिस्टम में कर्मचारियों का टोटा, जहां आज भी करीब 17 पद रिक्त पड़े हुए हैं.
हर साल प्रदेश में 40,000 दवाइयों के सैंपल की जांच की जरूरी है, लेकिन प्रदेश का पूरा सिस्टम अपनी पूरी ताकत झोंकने के बाद भी बमुश्किल केवल 6000 दवा सैंपलो की जांच कर पा रहा है. हैरान करने वाली बात यह है कि मध्य प्रदेश के पास मौजूद इतना लैब ही नहीं हैं, जहां इतनी बड़ी संख्या में जांच संभव हो सके.मध्य प्रदेश में ड्रग इंस्पेक्टर के पद 96 हैं 79 भरे हैं 17 खाली हैं. ऐसे में कई ड्रग इंस्पेक्टर के पास अपने से अलग जिले का भी अधिभार है.यही वजह है कि प्रदेश में मौजूद तीन लैब पर कार्य भार अधिक है.
नियम कहता है कि हर महीने प्रत्येक ड्रग इंस्पेक्टर को कम से कम पांच दवाइयां के सैंपल रखने की जरूरत है. इन जांच सैंपलों की रिपोर्ट लैबोरेट्रीज में कई महीनो से पेंडिंग है. होता यह है कि जांच रिपोर्ट आने से पहले दवाइयो का बैच मार्केट में बिकने के लिए तैयार हो जाती हैं.मध्य प्रदेश में दवा नियंत्रण संबंधी जांच के लिए तीन लैबोरेट्रीज काम कर रही हैं. एक जबलपुर, एक भोपाल और तीसरी इंदौर में सैंपल की जांच करती है. जानकारी बताती है कि हर साल में इन लैबोरेट्रीज को 40,000 दवाइयां के सैंपेल गुणवत्ता के मापदंडों पर परखने हैं, लेकिन यह सिर्फ 6000 दवाइयो के सैंपल की रिपोर्ट जारी कर पा रही हैं.
मध्य प्रदेश की सरकारी मशीनरी के पास केवल चार ड्रग एनालिस्ट हैं. इसके अलावा आउटसोर्स पर रखे गए सहायक कर्मचारी की संख्या को भी मिला लिया जाए तो लगभग यहां ड्रग एनालिस्ट की संख्या महज 12 से 15 है. कह सकते हैं कि पूरा सिस्टम राम भरोसे है,दवाइयों का नियंत्रण और उनकी जांच पड़ताल कोई मामूली काम नहीं है. एक दवा सैंपल को पूरी तरह परखने और उसकी गुणवत्ता को साबित करने के लिए करीब 10 घंटे का लंबा वक्त लगता है.यही वजह है कि एमपी में अभी भी 5000 दवा सैंपलों की जांच रिपोर्ट पेंडिंग हैं. ऐसे में हर महीने 100 सैंपेल की जांच ही संभव है.
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