रांची, 13 दिसम्बर (आईएएनएस)। झारखंड के जनजातीय नेताओं ने राज्य की जनजातियों के भू-अधिकारों के निपटान के लिए गठित अनुसूचित क्षेत्र विनियमन (एसएआर) अदालतों को बंद करने की मुख्यमंत्री रघुबर दास की घोषणा पर सवाल उठाए हैं।
एसएआर अदालतों को छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनसी एक्ट) 1969 के तहत गठित किया गया था।
पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड विकास मोर्चा-प्रजातांत्रिक के अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा, “मुख्यमंत्री ने विधि विशेषज्ञों और राजनेताओं से विचार-विमर्श किए बगैर ही एसएआर अदालतों को बंद करने का फैसला ले लिया। यह एकतरफा फैसला है।”
मरांडी के मुताबिक, इन अदालतों को जनजातियों की भूमि के गैर कानूनी हस्तांतरण को रोककर उनकी मदद करने के लिए गठित किया गया था।
मरांडी ने कहा, “भूमि माफिया इन अदालतों का दुरुपयोग करते थे, लेकिन उनके दुरुपयोग को रोकने के बजाय, राज्य ने अदालतों को ही बंद करने की घोषणा कर दी।”
पूर्व मंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा के विधायक चंपई सोरेन ने कहा, “यह दास की कई घोषणाओं में से एक है। हम उनकी घोषणाओं को गंभीरता से नहीं लेते, क्योंकि कुछ भी लागू नहीं किया जाता।”
सोरेन ने कहा, “अगर जरूरत पड़ी तो हम यह मुद्दा राज्य विधानसभा में उठाएंगे।”
पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी और निर्दलीय विधायक गीता कोड़ा ने कहा, “एसएआर अदालतों को बंद करने की घोषणा किसी वैकल्पिक व्यवस्था के साथ की जानी चाहिए थी। इन अदालतों को जनजातियों के भूमि अधिकारों की सुरक्षा के लिए गठित किया गया था। अब क्या विकल्प है?”
झारखंड में राज्य की आबादी का 27 प्रतिशत हिस्सा जनजातियों का है।
एक अधिकारी ने आईएएनएस से कहा, “हम एसएआर अदालतों के कानूनी पहलुओं पर विचार कर रहे हैं। लगता है कि मुख्यमंत्री अधिनियम से अनभिज्ञ हैं और उन्होंने जल्दबाजी में इन अदालतों को बंद करने की घोषणा कर दी है।”
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