लकड़ी कारोबारियों की गुटबंदी से हिमाचल को भारी नुकसान : सीएजी

शिमला, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। नगदी की तंगी से जूझ रहे हिमाचल प्रदेश राज्य वन विकास निगम लिमिटेड को लकड़ी क्रेताओं की गुटबंदी के कारण 2014-15 के अंत तक 52.75 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। यह बात भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने कही है।

सीएजी ने कहा है कि व्यवसायियों की गुटबंदी के कारण अकेले देवदार की लकड़ी की बिक्री से इस लकड़ी बहुल राज्य को 18 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है।

सीएजी की रपट के मुताबिक, निगम को 2015 के अंत तक लगातार चार वर्षो तक घाटा हुआ है।

नतीजतन 2010-11 में निगम का कुल घाटा 31.66 करोड़ रुपये था, जो 2014-15 में बढ़कर 52.75 करोड़ रुपये हो गया।

लकड़ी की बिक्री से हुए घाटे पर टिप्पणी करते हुए महालेखाकार ने कहा है कि लकड़ी की नीलामी से 2010-15 के दौरान जो दाम मिले, उनमें और बाजार मूल्य में 60 से 105 प्रतिशत का अंतर था। इसका मतलब है कि निगम को नीलामी से प्रतिस्पर्धी मूल्य नहीं मिल रहे हैं।

सीएजी ने सरकार को ई-नीलामी के जरिए अधिक बोलीदाताओं को आकर्षित करने और क्रेताओं की गुटबाजी पर अंकुश लगाने की सलाह दी है।

सीएजी ने कहा है कि सीमित प्रतिस्पर्धा या क्रेताओं की गुटबाजी से बोलीदाताओं को फिलहाल बड़े पैमाने पर लाभ हो रहा है।

सीएजी ने कहा, “विस्तृत प्रचार के जरिए अच्छी बिक्री दर प्राप्त करने की कोशिश हुई होती तो तो निगम को अकेले देवदार की लकड़ी की बिक्री से 18 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो सकता था।”

रपट में कहा गया है कि लकड़ी के खुदरा मूल्य में लगातार वृद्धि होने के बावजूद नीलामी के दौरान 2013-14 की तुलना में 2014-15 में निगम को कम दरें मिलीं हैं।

सीएजी ने कहा कि दुर्गम क्षेत्रों अलाभकारी पेड़ों के अधिग्रहण से भी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन हुआ है। इसके चलते निगम को 1.52 करोड़ रुपये की हानि हुई।

रपट में लकड़ी के वर्गीकरण पर भी उंगली उठाई गई और कहा गया है कि सिर्फ 0.5 प्रतिशत लकड़ी ‘ए’ श्रेणी की थी।

सीएजी ने कहा, “लकड़ी के वर्गीकरण की प्रक्रिया पर कोई नियंत्रण नहीं था। गलत वर्गीकरण के चलते संभावित राजस्व में 25 फीसदी की कमी का अनुमान लगाया गया, जो करीब 71.64 करोड़ रुपये के बराबर था।”

निगम को लकड़ी की बिक्री और निष्कर्षण के क्षेत्र में एकाधिकार प्राप्त है। निगम ने गत साल अक्टूबर में महालेखाकार को दिए अपने जवाब में कहा था कि सुझावों और संस्तुतियों को नई विपणन नीति में शामिल किया जाएगा।

भारतीय वन सर्वेक्षण रपट 2011 के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश का कुल भौगोलिक क्षेत्र 55,673 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें 3,224 वर्ग किलोमीटर में सघन जंगल, 6381 वर्ग किलोमीटर में मामूली घने जंगल और 5074 वर्ग किलोमीटर में खुले जंगल हैं।

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