भाजपा बताए आपातकाल में कितनों ने माफी मांगी थी : सरोज

भोपाल, 24 जून (आईएएनएस)। देश में आपातकाल के 41 वर्ष हो रहे हैं और इस मौके पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर देश के कई अन्य हिस्सों में समारोह आयोजित कर रही है। भाजपा के इन आयोजनों पर मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की मध्य प्रदेश इकाई के सचिव बादल सरोज ने भाजपा से पूछा है कि उसे यह भी बताना चाहिए कि आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और तत्कालीन जनसंघ से जुड़े कितने लोग माफीनामा भरकर जेल से छूटे थे।

भोपाल, 24 जून (आईएएनएस)। देश में आपातकाल के 41 वर्ष हो रहे हैं और इस मौके पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर देश के कई अन्य हिस्सों में समारोह आयोजित कर रही है। भाजपा के इन आयोजनों पर मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की मध्य प्रदेश इकाई के सचिव बादल सरोज ने भाजपा से पूछा है कि उसे यह भी बताना चाहिए कि आपातकाल के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और तत्कालीन जनसंघ से जुड़े कितने लोग माफीनामा भरकर जेल से छूटे थे।

सरोज ने कहा, “भाजपा आपातकाल का जिक्र कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है। लेकिन उसे यह भी बताना चाहिए कि आरएसएस और तत्कालीन जनसंघ से जुड़े कितने लोग माफी मांग कर जेल से छूटे थे।”

सरोज कहते हैं कि संघ और जनसंघ से जुड़े लोग ही नहीं तत्कालीन संघ प्रमुख मधुकर दत्तात्रेय देवरस (बालासाहेब देवरस) ने भी माफीनामा दिया था।

उन्होंने कहा कि उस समय यरवदा जेल से देवरस ने इंदिरा गांधी को कई पत्र लिखे थे, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री के 20 सूत्री और संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम को देश हित में बताया था और उसमें सहयोग का वादा भी किया था।

मध्य प्रदेश के ग्वालियर से नाता रखने वाले सरोज वर्ष 1975 में महज 19 वर्ष के थे, और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) से जुड़े थे। तब उन्हें उनके सहयोगी शैलेंद्र शैली के साथ सरकार विरोधी पोस्टर लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके पहले वह कुछ दिनों तक भूमिगत रहे थे। उस दौरान पुलिस उनके पिता और जनवादी कवि मुकुट बिहारी सरोज को थाने बुला लिया करती थी।

देश में आपातकाल की बरसी के मौके पर सरोज ने आईएएनएस से कहा, “वह दिन अब भी याद है, जब लोगों में सरकार और व्यवस्था के खिलाफ गजब का गुस्सा था। सरकार ने जेल भेजा, तब भी लोग डिगने को तैयार नहीं थे।”

सरोज ने कहा, “आपातकाल में हजारों और भी ऐसे लोग थे, जो बिना किसी लाभ की लालसा में जेल गए थे। मगर अब तो जेल जाने का लाभ उठाने वालों की कतार लगी हुई है। सरकारें अपनों को पेंशन देकर उपकृत कर रही हैं, दीगर सुविधाओं की बात हो रही है। आपातकाल का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिशें जारी हैं।”

ग्वालियर जेल में बंद रहे सरोज कहते हैं, “तब वहां लगभग 375 लोगों को गिरफ्तार कर लाया गया था। इनमें कम्युनिस्ट, समाजवादी, सवरेदयी, आरएसएस व जनसंघ और अन्य संगठनों से जुड़े लोग थे। इन लोगों को तत्कालीन सरकार ने माफीनाम भरने पर रिहा करने का एलान किया और जेल में कनस्तर काटकर (डाक खाने के डिब्बे की तरह) रख दिया गया, जिसमें आवेदन डाले जा रहे थे।”

सरोज के मुताबिक, उस समय सभी बैरकों को रात के समय खुला रखा जाता था और मुख्य द्वार बंद होता था। उनकी बैरक ऊपर थी, वह रात को देखते कि कनस्तर में माफीनामा डालने वालों की कतार लगी है। 15 दिन बाद आलम यह हो गया कि जेल प्रशासन को माफीनामे के लिए दो कनस्तर रखने पड़े। आपातकाल की अवधि खत्म होने तक जेल में राजनीतिक कैदियों की संख्या 375 से घटकर महज 50 रह गई थी।

सरोज ने एक सवाल के जवाब में कहा कि उन जैसे कई लोग ऐसे हैं, जो किसी लाभ के लिए जेल नहीं गए थे। यही कारण है कि वह और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े लोग राज्य सरकारों द्वारा दी जा रही पेंशन नहीं ले रहे हैं। अलबत्ता उन्होंने पेंशन का विरोध भी किया था। उन्होंने कहा कि पेंशन के पीछे राज्य सरकारें अपनों को उपकृत कर रही हैं।

वह आगे कहते हैं, “जो आपातकाल के दौरान माफी मांग कर छूटे थे, वे आज उसी आपातकाल की बरसी मना रहे हैं। यह उनके विवेक पर सवाल खड़ा करता है। वास्तव में ये लोग माफीनामा भरने वाले और पेंशनखोर हैं।”

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