शिमला, 26 जुलाई (आईएएनएस)। अधिकारों के प्रचारक राजेश्वर नेगी ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की परवर्ती सरकारें वन अधिकार अधिनियम 2006 (एफआरए) को अधिसूचित और लागू करने में विफल रही हैं और जंगल में रहने वाले लोगों के अधिकारों को नष्ट करने की इजाजत दी है।
भारतीय समाज कल्याण परिषद के अध्यक्ष नेगी ने आईएएनएस से कहा कि केंद्र सरकार ने साल 2008 में एफआरए बनाया, लेकिन हिमाचल प्रदेश सरकार ने उसे लागू नहीं किया है।
नेगी ने कहा कि उल्टे हिमाचल सरकार साल 2012 से एफआरए को लागू करने से मुक्ति चाह रही है। उसका तर्क है कि साल 1971 में वन निपटान के तहत हिमाचल प्रदेश में सारे वन अधिकारों का निपटारा हो गया था।
शिमला के रहने वाले नेगी ने कहा कि गत दशक में करीब 1000 एकड़ वन जल विद्युत परियोजनाओं, खनन और सड़क परियोजनाओं के लिए आवंटित किए गए हैं।
नेगी ने मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को लिखे पत्र में कहा, “6 अप्रैल, 2006 के हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले के मद्देनजर वन जंगल में रहने वालों को जबरन बेदखल किया जा रहा है, वन अधिनियम 1927 लागू किया जा रहा है जबकि वन में रहने वाले लोग एफआरए 2006 के तहत संरक्षित हैं जिसका अधिक्रमण नहीं किया जा सकता है।”
कानून के तहत 13 दिसंबर, 2005 से पहले ऐसे वन वासियों के वास्तविक कब्जे में जो वन भूमि थी उसके वे मालिक हैं। ऐसे लोगों की पहचान कर उन्हें मालिकाना हक देना है।
इतना ही नहीं, कानून के अनुसार मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक वन वासियों (अनुसूचित जनजाति या अन्य परंपरागत वन वासी)को वन भूमि से बेदखल नहीं किया जाएगा।
नेगी ने कहा कि केंद्रीय जनजातीय मामले के मंत्रालय ने जून, 2015 को राज्यों को जनजातियों के दावों के सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके कोई स्पष्ट प्रगति नहीं हुई है।
नेगी ने कहा कि संबद्ध ग्राम सभा की संस्तुति के बिना किसी भी आधारभूत संरचना को मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए।
उन्होंने वीरभद्र सिंह को लिखे अपने पत्र में एफआरए, 2006 तुरंत लागू करने की इच्छा जाहिर की है।
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