बसपा प्रमुख मायावती पर अपमानजनक टिप्पणी के मामले में दर्ज प्राथमिकी को चुनौती देते हुए भाजपा के पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह की ओर से गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिए उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक याचिका दायर की गई थी।
इस याचिका पर गुरुवार को न्यायमूर्ति अजय लांबा व न्यायमूर्ति रवींद्रनाथ मिश्रा (द्वितीय) की खंडपीठ ने सुनवाई की। सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने दयाशंकर सिंह की गिरफ्तारी पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है और इस संबंध में राज्य सरकार से भी जवाब मांगा है।
उच्च न्यायालय में दयाशंकर की याचिका पर भाजपा के विधि प्रकोष्ठ के पूर्व राष्ट्रीय संयोजक व वरिष्ठ अधिवक्ता राघवेंद्र सिंह ने उनका पक्ष रखा।
अधिवक्ता दिलीप कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, याचिका में कहा गया है कि दयाशंकर सिंह निर्दोष हैं। उनके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता। यह भी तर्क दिया गया है कि घटनास्थल मऊ है तो लखनऊ में प्राथमिकी कैसे दर्ज की जा सकती है। साथ ही एससी-एसटी अधिनियम के तहत भी कोई अपराध नहीं बनता।
याचिका के अनुसार, दयाशंकर को राजनीतिक रंजिश की वजह से फंसाया जा रहा है और केस की निष्पक्ष विवेचना होनी चाहिए।
वहीं इसके विरोध में बसपा के राष्ट्रीय महासचिव तथा राज्यसभा सदस्य सतीश चंद्र मिश्रा ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि समाज में सार्वजनिक रूप से किसी भद्र महिला के लिए इस तरह की टिप्पणी करने वाले को अगर कोर्ट से राहत मिलेगी, तो समाज में महिलाओं का सम्मान बचाना मुश्किल हो जाएगा।
अदालत ने दयाशंकर की याचिका खारिज कर व राज्य सरकार से जवाब मांगते हुए मामले की अगली सुनवाई आठ अगस्त नियत कर दी है।
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