मोदी सरकार के 4 साल में भारत हुआ पड़ोसियों से दूर

नई दिल्ली, 24 मई (आईएएनएस)। आज से लगभग चार साल पहले जब भाजपा सत्ता में आई थी, तो सरकार ने ‘पड़ोसी प्रथम’ का नारा दिया था। सरकार की मंशा पड़ोसियों को अधिक तवज्जो देकर रिश्ते बेहतर करने की थी, लेकिन अब जब सरकार अपने कार्यकाल के चार साल पूरे करने जा रही है तो पलटकर देखने की जरूरत है कि हमारे पड़ोसियों ने हमसे दूरी क्यों बना ली?

नई दिल्ली, 24 मई (आईएएनएस)। आज से लगभग चार साल पहले जब भाजपा सत्ता में आई थी, तो सरकार ने ‘पड़ोसी प्रथम’ का नारा दिया था। सरकार की मंशा पड़ोसियों को अधिक तवज्जो देकर रिश्ते बेहतर करने की थी, लेकिन अब जब सरकार अपने कार्यकाल के चार साल पूरे करने जा रही है तो पलटकर देखने की जरूरत है कि हमारे पड़ोसियों ने हमसे दूरी क्यों बना ली?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रमुखों को न्योता दिया था, जिसमें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को छोड़कर बाकी देशों के प्रमुखों ने शिरकत भी की थी। मोदी की ‘नेबर डिप्लोमेसी’ शुरुआती साल में चर्चा का विषय भी रही, लेकिन आज की तारीख में पाकिस्तान के साथ नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान के साथ भी भारत के संबंधों में तल्खी आ गई है।

हमारा पड़ोसी श्रीलंका पाला बदलकर अब चीन के ज्यादा नजदीक हो गया है। चीन और श्रीलंका के बीच हम्बनटोटा को लेकर हुए समझौते ने भारत को श्रीलंका से दूर कर दिया। चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के जरिए भारत को उसके पड़ोसी देशों से दूर करने की कूटनीतिक चाल चली, जिससे बेपरवाह मोदी ब्रिटेन और अमेरिका सहित यूरोपीय देशों का दौरा करने में मशगूल रहे।

राजनीतिक मामलों के जानकार पुष्पेश पंत कहते हैं, “चीन एक सोची-समझी राजनीति के जरिए भारत के पड़ोसी देशों में अपना प्रभुत्व बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के दौरे अपनी छवि चमकाने के मकसद से अधिक हो रहे हैं। किसी देश का दौरा करने मात्र से संबंध नहीं सुधरते। आप पड़ोसी देशों की किस तरह से मदद करते हैं, यह अधिक मायने रखता है।”

हालांकि, श्रीलंका में चीन की चाल को नाकाम करने के लिए सेना प्रमुख ने कोलंबो का दौरा किया था, लेकिन श्रीलंका में चीन के लगातार निवेश के कारण यह दूरी कम नहीं हो पाई।

मोदी ने हमेशा से अपनी ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति में नेपाल को प्राथमिकता देने की बात कही। नेपाल में 2015 में भीषण भूकंप के बाद भारत ने बढ़-चढ़कर मदद भी की थी, जिससे नेपाल में मोदी की छवि को जबरदस्त लाभ पहुंचा लेकिन नेपाल में नए संविधान निर्माण के बाद मधेशियों की उपेक्षा से दोनों देशों के संबंधों में तल्खी बढ़ा दी।

इस दौरान नेपाल ने भारत पर आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया। इस आर्थिक नाकेबंदी के बीच नेपाल ने चीन से उम्मीदें लगाईं। इस आर्थिक नाकेबंदी के बाद ही नेपाल ने विचार किया कि यदि भविष्य में इस तरह की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो भारत का विकल्प तो होना ही चाहिए और वह विकल्प नेपाल को चीन में नजर आया। भारत और नेपाल के बीच 2016 में संबंध उस समय निचले स्तरों तक पहुंच गए थे, जब नेपाली की राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी ने भारत दौरा रद्द कर अपने राजदूत को वापस बुला लिया था।

अब एक अन्य पड़ोसी म्यांमार की बात करें, तो म्यांमार में लगभग चार लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। हाल के दिनों में म्यांमार और बांग्लादेश के बीच रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर विवाद रहा, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने इस विवाद को धार्मिक चोला पहनाकर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली और चीन तीन सूत्रीय सुलह का फॉर्मूला सुझाकर म्यांमार के करीब पहुंच गया।

बांग्लादेश और भारत के बीच संबंध 2014 में हुए कुछ समझौतों के साथ सही दिशा में आगे चल रहे थे, लेकिन तीस्ता जल समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच कुछ खटास देखने को मिली। बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर भी भारत और पड़ोसी देश बांग्लादेश के बीच संबंधों में तल्खी बढ़ी।

मालदीव की संसद में आधीरात के समय चीन का विवादित ‘फ्री ट्रेड समझौता’ पारित होने से मालदीव चीन के करीब पहुंच गया। मालदीव ने भारत के राजदूत से मिलने वाले अपने तीन स्थानीय काउंसिलर को बर्खास्त करने से मामला और पेचीदा हो गया। यह भी सोचने की बात है कि नेपाल का चार बार दौरा कर चुके मोदी ने पद संभालने के बाद से एक बार भी मालदीव का दौरा नहीं किया है।

पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध किसी से छिपे नहीं है तो ऐसे में सरकार अपने पड़ोसियों को लेकर कहां चूक कर रहा है?

चीन और पाकिस्तान की दोस्ती भारत के लिए सिरदर्द से कम नहीं है। इन चार वर्षों में सरकार पाकिस्तान के साथ टकराव की स्थिति को कम नहीं कर सकी। सर्जिकल स्ट्राइक से जरूर सरकार ने दुश्मन के घर में घुसकर उसे सबक सिखाने का ढोल पीटा हो, लेकिन उसके बाद सीमा पर किस तरह का माहौल रहा, वह किसी से छिपा नहीं है।

चीन के साथ रिश्ते खट्टे हुए, उसी का नतीजा रहा कि चीन ने एनएसजी में भारत की स्थायी सदस्यता में रोड़े अटकाए तो मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित होने से बचाने के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल किया। डोकलाम विवाद इसका ज्वलंत उदाहरण है। डोकलाम विवाद के समय भारत-चीन युद्ध का अंदेशा तक जताए जाने लगा था।

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