संयुक्त राष्ट्र शांति प्रयासों पर विशेष ध्यान दे : भारत

संयुक्त राष्ट्र, 20 जनवरी (आईएएनएस)। भारत ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र को सश संघर्ष में नागरिकों की हिफाजत का स्थायी समाधान निकालने के लिए शांति प्रयासों पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने मंगलवार को सुरक्षा परिषद को संबोधित करते हुए कहा, “संयुक्त राष्ट्र को विवाद के शुरुआत में ही शांति प्रयासों में लग जाना चाहिए। इसके लिए सश संघर्ष की वजह को राष्ट्रीय सहमति से दूर करने का प्रयास करना चाहिए ताकि समाज के सभी तबके को राजनीतिक प्रक्रिया में भागीदारी मिले और वे शांतिपूर्वक साथ-साथ रह सकें।” अकबरुद्दीन हाल ही में संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त किए गए हैं।

सश संघर्ष में नागरिकों की सुरक्षा पर आयोजित चर्चा में अकबरुद्दीन ने कहा कि विश्व संस्था को संयुक्त राष्ट्र शांति प्रयासों में नागरिकों की सुरक्षा के स्थायी समाधान पर जोर देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि नागरिकों की सुरक्षा मुख्य रूप से एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी है। इसके लिए किसी हस्तक्षेप तंत्र के निर्माण के बजाए राष्ट्रीय क्षमता निर्माण पर ध्यान देना चाहिए।

अकबरुद्दीन ने 1960 में संयुक्त राष्ट्र के कांगो अभियान के दौरान मारे गए भारतीय सेना के कैप्टन गुरवचन सिंह सलारिया की वीरता को याद करते हुए कहा कि हालांकि शांति सैनिकों की जान हमेशा खतरे में रहती है, लेकिन वे संघर्ष के बीच नागरिकों की जान बचाने का अपना प्रयास जारी रखते हैं। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में नागरिकों की सुरक्षा का आदेश नहीं होने के बावजूद सालारिया और अन्य 45 भारतीय सैनिकों ने नागरिकों की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया।

सलारिया दिसंबर 1961 में कांगो में विद्रोहियों से लड़ते हुए शहीद हुए थे। उन्हें मरणोपरांत भारत के सबसे बड़े सैन्य पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

अकबरुद्दीन ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को उनकी शहादत को मान्यता देने और पदक देने में 35 साल लग गए।

अकबरुद्दीन ने परिषद को सेना भेजने वाले देशों से सलाह-मशविरा करने की सलाह देते हुए कहा, “सालों से शांति अभियानों में भाग लेनेवाले एक विकासशील देश के नाते हम समझते हैं कि परिषद, सचिवालय और सेना भेजनेवाले देशों के बीच लगातार संवाद की आवश्यकता है। इससे नागरिकों की रक्षा करने में परिषद के प्रभाव और विश्वसनीयता में वृद्धि होगी।”

उन्होंने कहा कि संवाद का यह अभाव दुखदायक है। क्योंकि सेना भेजनेवाला देश संयुक्त राष्ट्र की सेवा में अपने सैनिकों की जान को जोखिम में डालता है।

पिछले महीने परिषद ने स्वीकार किया था कि सेना भेजनेवाले देशों के साथ सलाह-मशविरा की प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण है और इसके लिए सार्थक आदान-प्रदान, प्रतिनिधित्व की जरूरत है।

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