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नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

nageshwarभारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य के बाहरी क्षेत्र में द्वारिकापुरी से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस च्योतिर्लिंग की शास्त्रों में अद्वभुत महिमा कही गई है। धर्म शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव को नागों के देवता के रूप में जाना जाता है।

नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। इस पवित्र च्योतिर्लिंग के दर्शन की भारतीय कथा पुराणों में एक बड़ी महिमा बताई गई है। माना जाता है कि जो भक्त इस मंदिर में बैठकर श्रद्धापूर्वक माहात्म्य की कथा सुनता है उसके पाप धुल जाते हैं।

पौराणिक कथा

अन्य च्योतिर्लिंगों की तरह नागेश्वर च्योतिर्लिग के संम्बन्ध में एक कथा प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार ‘सुप्रिय’ नाम का एक व्यापारी भगवान शिव का अनन्य भक्त था। उसके बारे ऐसा माना जाता था कि वह बहुत ही ज्यादा धर्मात्मा, सदाचारी था। उसकी इस भक्ति और सदाचारिता से एक बार दारुक नाम का राक्षस नाराज हो गया। राक्षस प्रवृ्ति का होने के कारण उसे भगवान शिव जरा भी अच्छे नहीं लगते थे, इसलिए वह ऐसे अवसरों की तलाश करता था जिससे वह सुप्रिय को नुकसान पहुंचा सके।

एक दिन जब वह नौका (नाव) पर सवार होकर समुद्र के जलमार्ग से कहीं जा रहा था, उस समय दारुक ने उस पर आक्त्रमण कर दिया। राक्षस दारुक ने नाव पर सवार सभी लोगों सहित सुप्रिय का अपहरण कर लिया और अपनी पुरी में ले जाकर उसे बंदी बना लिया। जैसा कि सुप्रिय शिव जी का अनन्य भक्त था, इसलिए वह हमेशा शिव जी की आराधना में तन्मय रहता था ऐसे में कारागार में भी उसकी आराधना बंद नहीं हुई और उसने अपने अन्य साथियों को भी शंकर जी की आराधना के प्रति जागरुक कर दिया। वे सभी शिवभक्त बन गए। कारागार में शिवभक्ति का ही बोलबाला हो गया।

जब इसकी सूचना राक्षस दारुक को मिली तो वह क्त्रोध में उबल उठा। वह व्यापारी के पास कारागार में पहुंचा। व्यापारी उस समय पूजा और ध्यान में मग्न था। राक्षस ने उसी ध्यानमुद्रा में उस पर क्त्रोध करना प्रारम्भ कर दिया लेकिन इसका असर सुप्रिय पर नहीं पड़ा। तंग आकर राक्षस ने अपने अनुचरों से कहा कि वे व्यापारी को मार डालें। यह आदेश भी व्यापारी को विचलित न कर सके। इस पर भी व्यापारी अपनी और अपने साथियों की मुक्ति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करने लगा। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसी कारागार में एक ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए। भगवान शिव ने व्यापारी को पाशुपत-अस्त्र दिया ताकि वह अपनी रक्षा कर सके। इस अस्त्र से सुप्रिय ने राक्षस दारुक तथा उसके अनुचरों का वध कर दिया। उसी समय से भगवान शिव के इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के अतिरिक्त नागेश्वर नाम से दो अन्य शिवलिंगों की भी चर्चा ग्रन्थों में प्राप्त होती है। ज्योतिर्लिंग के रूप में द्वारिकापुरी का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग विश्वभर में प्रसिद्ध है।

द्वारिकापुरी के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के परिसर में भगवान शिव की ध्यान मुद्रा में एक बड़ी ही मनमोहक अति विशाल प्रतिमा है जिसकी वजह से मंदिर तीन किलोमीटर की दूरी से ही दिखाई देने लगता है। यह मूर्ति 125 फीट ऊंची तथा 25 फीट चौड़ी है। मुख्य द्वार साधारण लेकिन सुन्दर है। मंदिर में पहले एक सभागृह है, जहां पूजन सामग्री की छोटी-छोटी दुकानें लगी हुई हैं।

मंदिर की समय सारिणी

नागेश्वर मंदिर सुबह पांच बजे प्रात: आरती के साथ खुलता है जबकि आम जनता के लिए मंदिर छ: बजे खुलता है। सुबह से ही मंदिर के पुजारियों द्वारा कई तरह की पूजा और अभिषेक किए जाते हैं। भक्तों के लिए शाम चार बजे श्रृंगार दर्शन होता है जिसके बाद गर्भगृह में प्रवेश बंद हो जाता है। आरती शाम सात बजे होती है तथा रात नौ बजे मंदिर बंद हो जाता है। त्यौहारों के समय यह मंदिर ज्यादा समय के लिए खोल दिए जाते हैं।

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